बुधवार, 5 मई 2021

खाली पेट पिसी अलसी खाने के 13 फायदे | Ground flax seeds in hindiBy समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबअलसी के बीज के फायदे पुरुषों व महिलाओं के लिए – (Flax seeds) अलसी पुरुषों की सेक्स समस्या ठीक करने और औरतों में हार्मोनल बैलन्स लाने का काम करता है। अलसी का सेवन मोटापा कम करता है और बाल, स्किन, आँखें, नाखून स्वस्थ होते हैं। अलसी खाना कई रोगों में फायदेमंद है।अलसी को तीसी, अरसी भी कहते हैं। आयुर्वेद में अलसी को ‘बाल्य’ कहा गया है मतलब जो शक्ति देता है। भारत में अलसी के औषधीय गुण का उपयोग आयुर्वेदिक उपचारों और खान-पान में पुराने समय से होता रहा है।अलसी के लड्डू खाना भी अलसी के फायदे पाने का तरीका है। अलसी के फायदे और कैसे खाए – Alsi seeds benefits in hindiअलसी के बीज में प्रोटीन, आयरन, कैल्सियम, विटामिन C, विटामिन E, विटामिन बी काम्प्लेक्स, जिंक, फाइबर, कॉपर, सेलेनियम, कैरोटीन, पोटैशियम, फोस्फोरस, मैगनिशियम, मैगनीस तत्व पाए जाते हैं। अलसी के बीज को English में Flax Seeds कहा जाता है। अलसी के बीज एंटी- बैक्टीरियल, एंटी-फंगल और एंटी-वायरल होते है। इनके उपयोग से शरीर की रोगों से लड़ने की ताकत (immunity) बढ़ती है। 1) अलसी के फायदे पुरुषों के लिए – Benefits of Alsi seeds in hindi– अलसी खाने से पुरुषों की कई सेक्स समस्यायें जैसे सेक्स में रूचि न होना, जल्दी उत्तेजित होना, सेक्स के दौरान नर्वसनेस, शारीरिक दुर्बलता, रक्त संचार (Blood circulation) से जुड़ी दिक्कतों से निजात मिलती है। – एक खास बात कि अलसी का सेवन पुरुषों में गंजापन पैदा करने वाले Enzyme को नष्ट करते हैं. अतः Baldness से बचाव के लिए पुरुष अलसी अवश्य खाएं। – बढ़ती हुई उम्र के पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर, ब्लैडर कैंसर होने का खतरा होता है। अलसी का सेवन करके इन कैंसर की आशंकाओं से बचा जा सकता है। पुरुषों को अलसी के फायदे का लाभ जरूर उठाना चाहिए। 2) अलसी पोषण से जुड़ी जानकारी – Tisi seeds benefits in hindi– अलसी के बीज Omega 3 fatty acids का बहुत अच्छा Source माने जाते हैं। डाईटिशियन और डाक्टर भी इसे खाने की सलाह देते है। अलसी खाना Omega 3 fatty acids के कैप्सूल का अच्छा विकल्प है। – ओमेगा-3 फ़ैटी एसिड हमारे शरीर को कई तरह से हेल्दी रखने में मदद करते हैं। ये सबसे अधिक मात्रा में समुद्री मछलियों से प्राप्त होता है लेकिन शाकाहारी लोग अलसी का सेवन करके इसके लाभ प्राप्त कर सकते हैं। सुबह खाली पेट अलसी खाने के फायदे – Ground flax seeds in hindiसुबह खाली पेट गर्म पानी में एक चम्मच पिसी अलसी मिलाकर पीने और रात को सोने से पहले इसी तरह अलसी लेने से शरीर डेटोक्स होता है। अलसी में मौजूद फाइबर व Omega 3 fatty acids शरीर में मौजूद हानिकारक चीजों को लीवर और आंतों से निकालकर शरीर से बाहर करने का काम करते हैं। अलसी द्वारा शरीर के इस Detoxification से अनावश्यक थकान, कमजोरी, सुस्ती, सूजन दूर होता है। 3) अलसी के बीज वजन कम करे – Alsi ke beej for weight loss in hindi :– अलसी के बीज से मोटापा कम होता है। अलसी में डाइटरी फाइबर भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इस वजह से अलसी खाने पर जल्दी भूख नहीं लगती।– अलसी का फाइबर पेट के लिए लाभदायक बैक्टीरिया को बढ़ावा देता है जिससे मेटाबोलिज्म की रेट तेज होती है, इससे ज्यादा कैलोरी बर्न होती है। यह फाइबर मल (stool) का निकास भी आसान करता है, जिससे कब्ज नहीं होता। – अलसी में अन्य Natural resources की तुलना में 800 गुना ज्यादा Lignans होते हैं। लिग्नास एंटी-ओक्सिडेंट की तरह काम करते हैं और शरीर में हानिकारक फ्री ऑक्सीजन रेडिकल्स को खत्म करते हैं। यही फ्री रेडिकल्स मेटाबोलिक रेट धीमा करके वजन बढ़ाते है और शरीर फूल जाता है। अलसी के बीज फ्री रेडिकल्स नष्ट करके मोटापे से मुक्ति दिलाते हैं। ground flaxseed in hindiFlax seeds in hindi4) अलसी के बीज के फायदे स्किन के लिए – Flax seeds benefits in hindi for skinअसली के बीज खाने से शरीर को मिलने वाले ओमेगा 3 फैटी एसिड्स स्किन के लिए लाजवाब हैं। यह बढती उम्र के असर जैसे झुर्रियों, महीन रेखाओं को दूर करता है। यह त्वचा के कील-मुहांसों को दूर करके स्किन को नयी चमक देता है, त्वचा का कसाव बनाये रखता है। – हाथ-पैर के नाखून को अलसी मजबूत और चिकना बनाता है। अलसी धूप की वजह से होने वाले स्किन डैमेज से सुरक्षा प्रदान करता है और स्किन कैंसर से बचाव करता है। – जाड़ों में अलसी का तेल (Flaxseed oil) स्किन पर लगाने से त्वचा रूखी नहीं होती और नर्म, मुलायम बनी रहती है। – अलसी का तेल स्किन की खुजली, लालपन, सूजन, दाग-धब्बे दूर करके एक बढ़िया Moisturizer का काम करता है। यह स्किन समस्या Eczema, Psoriasis के उपचार में भी कारगर माना गया है। अलसी के बीज खाने से घाव भी जल्दी भरता है। अलसी के फायदे अलसी के फायदे5) Flaxseed कैसे खाये – Flax seeds khane ka tarika :एक दिन में 2 टेबलस्पून (40 ग्राम) से ज्यादा अलसी के बीज का सेवन न करें। अलसी के साबुत बीज कई बार हमारे शरीर से पचे बिना निकल जाते हैं इसलिए इन्हें पीसकर ही इस्तेमाल करना चाहिए। a) 20 ग्राम (1 टेबलस्पून) अलसी पाउडर (Ground flax seeds) को सुबह खाली पेट हल्के गर्म पानी के साथ लेने से शुरुआत करें। b) आप इसे फल या सब्जियों के ताजे जूस, दही-छाछ में मिला सकते हैं या अपने भोजन में ऊपर से बुरक कर भी खा सकते हैं। इसे रोटी, पराठे, दलिया बनाते समय भी मिलाया जा सकता है। थॉयरॉइड में अलसी के फायदे – Flaxseed benefits for thyroid in hindic) दो कप पानी में दो चम्मच अलसी डालकर उबालें, जब यह आधा रह जाये तो गैस बंद कर दें। पीने लायक गर्म रह जाए तो छानकर सुबह सुबह खाली पेट पी लें। ये उपाय हाइपरथाइरोइड और हाइपोथाइरोइड दोनों प्रकार के थाइरोइड की बीमारी में फायदेमंद है। अलसी से बना यह ड्रिंक डायबिटीज, शुगर कण्ट्रोल करने में भी असरकारक है। इसे पीने से आर्थराइटिस, जोड़ों के दर्द, हार्ट ब्लॉकेज, पेट की दिक्कतों जैसे कब्ज, अपच, मोटापे, बाल झड़ने, स्किन की प्रॉबलम्स में भी लाभ मिलता है।d) अलसी के बीज हल्का भून कर खाएं अथवा सलाद या दही में मिलाकर खाएं, चाहे तो जूस में मिलाकर पियें। यह जूस के स्वाद को बिना बदले उसकी पोषकता कई गुना बढ़ा देगा। e) साबुत अलसी लंबे समय तक खराब नहीं होती लेकिन इसका पाउडर (Ground flax seeds) हवा में मौजूद ऑक्सीजन के प्रभाव में खराब हो जाता है, इसलिए ज़रूरत के मुताबिक अलसी को ताज़ा पीसकर ही इस्तेमाल करें। इसे अधिक मात्रा में पीसकर न रखें। अलसी के बीज भूनकर खाना – Roasted flax seeds in hindif) बहुत ज्यादा सेंकने या फ्राई करने से अलसी के बीज का फायदा, औषधीय गुण नष्ट हो सकते हैं और इसका स्वाद बिगड़ सकता है। इसलिए अलसी के बीज को इतना भूनना चाहिए कि नमी निकल जाये। g) व्रत में अलसी के बीज खा सकते हैं क्योंकि ये कोई अनाज नहीं है। जैसे मूंगफली का सेवन भी व्रत में किया जाता है। मूंगफली भी एक बीज है। अलसी में भरपूर पोषक तत्व होते हैं जोकि व्रत में फायदेमंद भी है। 6) अलसी के फायदे बालों के लिए –जैसा कि आप जानते हैं अलसी Omega 3 fatty acids का बढ़िया स्रोत है। ये फैटी एसिड्स बालों की अच्छी बढ़त के लिए जरुरी है। – अलसी का सेवन बालों की जड़ों से लेकर सिरों तक को पोषण देता है। इससे बाल लम्बे और मजबूत होते हैं इसलिए कम टूटते-झड़ते हैं। नए निकलने वाले बाल भी स्वस्थ और सुंदर होते हैं। Omega 3 fatty acids सर की स्किन को भी सूखने से बचाते हैं, जिससे डैंड्रफ यानि रूसी की समस्या भी नहीं होती। 7) महिलाओं के लिए अलसी के फायदे – Alsi seeds benefits in hindi– जिन औरतों का पीरियड रेगुलर नहीं होता और पीरियड के दौरान तेज दर्द रहता हो, उन्हें रोजाना अलसी खाना चाहिए। अलसी स्त्रियों के प्रजनन अंगों को स्वस्थ बनाता है, जिससे पीरियड नियमित होता है। – गर्भवती स्त्रियों और स्तनपान कराने वाली माताओं को अलसी का सेवन संतुलित मात्रा में करना चाहिए। अलसी के बीज स्तनपान के दौरान दूध न आने की समस्या को दूर करता है। आज भी शहरो और कस्बों के कई परिवारों में स्तनपान कराने वाली स्त्रियों को अलसी (तीसी) के बने लड्डू और अन्य भोज्य पदार्थ दिए जाते हैं। ये इस बात का सबूत है कि हमारे पूर्वज अलसी के बीज का महत्व अच्छी तरह जानते थे पर हम इन्हें भुलाकर सिर्फ दवाइयां खाने में विश्वास करने लगे। – अलसी के बीज औरतों के हार्मोनल बैलेंस के लिए बहुत सहायक होता है क्योंकि ये बीज Lignans का बहुत अच्छा स्रोत है जोकि Phytoestrogen और Anti-Oxidant गुणों से भरपूर है। – अलसी में पाए जाने वाला Phytoestrogen Adaptogenic होता है। अतः ये ऐसी महिलायें जिनके शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन बहुत ज्यादा है या जरुरत से कम है, दोनों को अलसी फायदा पहुँचाता है। – महिलाओं में रजोनिवृत्ति (Menopause) के दौरान होने वाली समस्याओं में भी अलसी के उपयोग से राहत मिलती है। यह देखा गया है कि माइल्ड मेनोपॉज़ की समस्या में रोजाना लगभग 40 ग्राम पिसी हुई अलसी खाने से वही लाभ प्राप्त होते हैं जो हार्मोन थैरेपी से मिलते हैं। 8) अलसी के फायदे आँखों के लिए –अलसी में मिलने वाला ओमेगा 3 फैटी एसिड्स तत्व नेत्र विकार, आँखों में सूखापन (Dry Eyes) के उपचार में असरदार है और डॉक्टर भी इसकी सलाह देते हैं। Omega 3 Fatty acids आँखों में नमी बराबर बनाये रखता है, जिससे ग्लूकोमा, High eye pressure के खतरे कम होते हैं। 9) अलसी के आयुर्वेदिक गुण – Ayurvedic benefits of flaxseed in hindi :आयुर्वेद में अलसी को मंद गंधयुक्त, मधुर, बलकारक, पित्तनाशक, स्निग्ध, पचने में भारी, गरम, पौष्टिक, कामोद्दीपक, किंचित कफ वात-कारक, पीठ के दर्द ओर सूजन को मिटानेवाली कहा गया है. जाड़ों में अलसी खाने से शरीर गर्म रहता है। – अलसी वात को संतुलित करता है, इसलिए वात बढ़ने की वजह से होने वाले विकारों का उपचार करता है। – अलसी के तेल को Flax seed oil या linseed oil कहते हैं। इसमें Alpha-linolenic Acid (ALA) नामक तत्व होता है जो एक प्रकार का ओमेगा-3 फ़ैटी एसिड (omega-3 fatty acid) है, जिसके कई सारे चिकित्सकीय लाभ हैं। 10) अलसी के गुण हार्ट के मरीज और ब्लड प्रेशर के लिए – – हृदय की धमनियों में कोलेस्ट्रॉल के जमने से हृदय रोग की सम्भावना बढ़ जाती है। इसलिए अलसी कोलेस्ट्रॉल कम करके हृदय रोग होने के खतरे को भी कम करता है। अलसी विटामिन B Complex, मैगनिशियम, मैगनीस तत्वों से भरपूर है जोकि LDL नामक बुरे कोलेस्ट्रोल को कम करते है। अलसी के सेवन से कोलेस्ट्रॉल के लेवल में कमी आना देखा गया है। 11) अलसी के बीज (Flax seeds in English) ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने, हाइपरटेंशन के रोगियों के लिए, ब्लड शुगर कंट्रोल में अत्यंत लाभदायक है। Type 1 और Type 2 Diabetes रोगियों के लिए अलसी डायबिटीज रोकने में कारगर पाया गया है। British Journal of Nutrition में प्रकाशित एक स्टडी में भाग लेने वाले लोगों के भोजन में 50 ग्राम अलसी 4 हफ्ते तक शामिल की गयी। नतीजा उनके रक्त में ब्लड शुगर लेवल की मात्रा 27 % तक कम हो गयी। 12) अलसी किडनी से जुड़ी समस्याओं में भी लाभकारी है। अलसी के बीज गरम पानी में उबालकर इसके साथ एक तिहाई भाग मुलेठी का चूर्ण मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से खूनी दस्त और और मूत्र संबंधी रोगों में लाभ होता है।13) अमेरिकी वैज्ञानिकों के एक शोध में पता चला है कि अलसी में जो Poly Unsaturated fatty acids होता है, वह विशेष रूप से स्तन का कैंसर, प्रोस्टेट और कोलन कैंसर (पेट के कैंसर) से बचाव करता है। अलसी के बीज ऑनलाइन खरीदने के लिए ये लिंक देखें > Flax Seedsअलसी के नुक्सान, अलसी किसे नहीं खाना चाहिए – Side effects of Flaxseed in hindi :1. अलसी खाने से कुछ लोगों को शुरुआत में कब्ज हो सकती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अलसी के बीज में फाइबर ज्यादा होता है। इसलिए अगर आप अलसी का सेवन कर रहे हो तो पानी भरपूर पियें। सही मात्रा में अलसी खाने से कब्ज दूर होती है, लेकिन ज्यादा अलसी खाने से लूज मोशंस भी हो सकता है। 2. प्रेगनेंसी के दौरान अलसी का सेवन डॉक्टर की सलाह लेकर 1 टेबलस्पून से अधिक नहीं करना चाहिए। बच्चा होने के बाद अलसी की बनी चीजों का सेवन निश्चिंत होकर कर सकते है। 3. अलसी खून को पतला करती है इसलिए यदि आपको Blood Pressure की समस्या हो तो इसके सेवन से पहले डॉक्टर से एक बार सलाह लें। 4. जरुरत से ज्यादा अलसी खाने से कुछेक लोगों को एलर्जी की शिकायत हो सकती है। इसके लक्षण हैं : पेट दर्द, उलटी, सांस लेने में दिक्कत, लो ब्लड प्रेशर आदि। किसी भी चीज़ की अति अच्छी नहीं होती। लेख में बताई गयी अलसी के बीज (Flaxseed) की सही मात्रा खाने से अलसी के सभी फायदों का लाभ लिया जा सकता है। बाल वनिता महिला आश्रमदुनिया के अनेक देशों में अलसी के बीज या Flax seeds लोकप्रिय और सेहतमंद आहार के रूप मे जाना जाता है। डिस्कलेमरः खानपान, किसी आयुर्वेदिक क्रिया या औषधि को अपनाने में स्वविवेक से काम लें, अति न करें। जानकार चिकित्सक से भी सलाह लें। इस वेबसाइट के सारे लेखों का उद्देश्य केवल शैक्षिक है। अलसी के फायदे (Benefits of flax seeds in Hindi) पर यह लेख अच्छा लगा तो 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खाली पेट पिसी अलसी खाने के 13 फायदे | Ground flax seeds in hindi

अलसी के बीज के फायदे पुरुषों व महिलाओं के लिए – (Flax seeds) अलसी पुरुषों की सेक्स समस्या ठीक करने और औरतों में हार्मोनल बैलन्स लाने का काम करता है। अलसी का सेवन मोटापा कम करता है और बाल, स्किन, आँखें, नाखून स्वस्थ होते हैं। अलसी खाना कई रोगों में फायदेमंद है।

अलसी को तीसी, अरसी भी कहते हैं। आयुर्वेद में अलसी को ‘बाल्य’ कहा गया है मतलब जो शक्ति देता है। भारत में अलसी के औषधीय गुण का उपयोग आयुर्वेदिक उपचारों और खान-पान में पुराने समय से होता रहा है।अलसी के लड्डू खाना भी अलसी के फायदे पाने का तरीका है। 

अलसी के फायदे और कैसे खाए – Alsi seeds benefits in hindi

अलसी के बीज में प्रोटीन, आयरन, कैल्सियम, विटामिन C, विटामिन E, विटामिन बी काम्प्लेक्स, जिंक, फाइबर, कॉपर, सेलेनियम, कैरोटीन, पोटैशियम, फोस्फोरस, मैगनिशियम, मैगनीस तत्व पाए जाते हैं। 

अलसी के बीज को English में Flax Seeds कहा जाता है। अलसी के बीज एंटी- बैक्टीरियल, एंटी-फंगल और एंटी-वायरल होते है। इनके उपयोग से शरीर की रोगों से लड़ने की ताकत  (immunity) बढ़ती है। 

1) अलसी के फायदे पुरुषों के लिए – Benefits of Alsi seeds in hindi

– अलसी खाने से पुरुषों की कई सेक्स समस्यायें जैसे सेक्स में रूचि न होना, जल्दी उत्तेजित होना, सेक्स के दौरान नर्वसनेस, शारीरिक दुर्बलता, रक्त संचार (Blood circulation) से जुड़ी दिक्कतों से निजात मिलती है। 

– एक खास बात कि अलसी का सेवन पुरुषों में गंजापन पैदा करने वाले Enzyme को नष्ट करते हैं. अतः Baldness से बचाव के लिए पुरुष अलसी अवश्य खाएं। 

– बढ़ती हुई उम्र के पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर, ब्लैडर कैंसर होने का खतरा होता है। अलसी का सेवन करके इन कैंसर की आशंकाओं से बचा जा सकता है। पुरुषों को अलसी के फायदे का लाभ जरूर उठाना चाहिए। 

2) अलसी पोषण से जुड़ी जानकारी – Tisi seeds benefits in hindi

– अलसी के बीज Omega 3 fatty acids का बहुत अच्छा Source माने जाते हैं। डाईटिशियन और डाक्टर भी इसे खाने की सलाह देते है। अलसी खाना Omega 3 fatty acids के कैप्सूल का अच्छा विकल्प है। 

– ओमेगा-3 फ़ैटी एसिड हमारे शरीर को कई तरह से हेल्दी रखने में मदद करते हैं। ये सबसे अधिक मात्रा में समुद्री मछलियों से प्राप्त होता है लेकिन शाकाहारी लोग अलसी का सेवन करके इसके लाभ प्राप्त कर सकते हैं। 

सुबह खाली पेट अलसी खाने के फायदे – Ground flax seeds in hindi

सुबह खाली पेट गर्म पानी में एक चम्मच पिसी अलसी मिलाकर पीने और रात को सोने से पहले इसी तरह अलसी लेने से शरीर डेटोक्स होता है। 

अलसी में मौजूद फाइबर व Omega 3 fatty acids शरीर में मौजूद हानिकारक चीजों को लीवर और आंतों से निकालकर शरीर से बाहर करने का काम करते हैं। अलसी द्वारा शरीर के इस Detoxification से अनावश्यक थकान, कमजोरी, सुस्ती, सूजन दूर होता है। 

3) अलसी के बीज वजन कम करे – Alsi ke beej for weight loss in hindi :

– अलसी के बीज से मोटापा कम होता है। अलसी में डाइटरी फाइबर भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इस वजह से अलसी खाने पर जल्दी भूख नहीं लगती।

– अलसी का फाइबर पेट के लिए लाभदायक बैक्टीरिया को बढ़ावा देता है जिससे मेटाबोलिज्म की रेट तेज होती है, इससे ज्यादा कैलोरी बर्न होती है। यह फाइबर मल (stool) का निकास भी आसान करता है, जिससे कब्ज नहीं होता। 

– अलसी में अन्य Natural resources की तुलना में 800 गुना ज्यादा Lignans होते हैं। लिग्नास एंटी-ओक्सिडेंट की तरह काम करते हैं और शरीर में हानिकारक फ्री ऑक्सीजन रेडिकल्स को खत्म करते हैं। 

यही फ्री रेडिकल्स मेटाबोलिक रेट धीमा करके वजन बढ़ाते है और शरीर फूल जाता है। अलसी के बीज फ्री रेडिकल्स नष्ट करके मोटापे से मुक्ति दिलाते हैं। 

ground flaxseed in hindi
Flax seeds in hindi

4) अलसी के बीज के फायदे स्किन के लिए – Flax seeds benefits in hindi for skin

असली के बीज खाने से शरीर को मिलने वाले ओमेगा 3 फैटी एसिड्स स्किन के लिए लाजवाब हैं। यह बढती उम्र के असर जैसे झुर्रियों, महीन रेखाओं को दूर करता है।  यह त्वचा के कील-मुहांसों को दूर करके स्किन को नयी चमक देता है, त्वचा का कसाव बनाये रखता है। 

– हाथ-पैर के नाखून को अलसी मजबूत और चिकना बनाता है। अलसी धूप की वजह से होने वाले स्किन डैमेज से सुरक्षा प्रदान करता है और स्किन कैंसर से बचाव करता है। 

– जाड़ों में अलसी का तेल (Flaxseed oil) स्किन पर लगाने से त्वचा रूखी नहीं होती और नर्म, मुलायम बनी रहती है। 

– अलसी का तेल स्किन की खुजली, लालपन, सूजन, दाग-धब्बे दूर करके एक बढ़िया Moisturizer का काम करता है। यह स्किन समस्या Eczema, Psoriasis के उपचार में भी कारगर माना गया है। अलसी के बीज खाने से घाव भी जल्दी भरता है। 

 

अलसी के फायदे
अलसी के फायदे

5) Flaxseed कैसे खाये – Flax seeds khane ka tarika :

  • एक दिन में 2 टेबलस्पून (40 ग्राम) से ज्यादा अलसी के बीज का सेवन न करें। 
  • अलसी के साबुत बीज कई बार हमारे शरीर से पचे बिना निकल जाते हैं इसलिए इन्हें पीसकर ही इस्तेमाल करना चाहिए। 

a) 20 ग्राम (1 टेबलस्पून) अलसी पाउडर (Ground flax seeds) को सुबह खाली पेट हल्के गर्म पानी के साथ लेने से शुरुआत करें। 

b) आप इसे फल या सब्जियों के ताजे जूस, दही-छाछ में मिला सकते हैं या अपने भोजन में ऊपर से बुरक कर भी खा सकते हैं। इसे रोटी, पराठे, दलिया बनाते समय भी मिलाया जा सकता है। 

थॉयरॉइड में अलसी के फायदे –  Flaxseed benefits for thyroid in hindi

c) दो कप पानी में दो चम्मच अलसी डालकर उबालें, जब यह आधा रह जाये तो गैस बंद कर दें। पीने लायक गर्म रह जाए तो छानकर सुबह सुबह खाली पेट पी लें। ये उपाय हाइपरथाइरोइड और हाइपोथाइरोइड दोनों प्रकार के थाइरोइड की बीमारी  में फायदेमंद है। 

अलसी से बना यह ड्रिंक डायबिटीज, शुगर कण्ट्रोल करने में भी असरकारक है। इसे पीने से आर्थराइटिस, जोड़ों के दर्द, हार्ट ब्लॉकेज, पेट की दिक्कतों जैसे कब्ज, अपच, मोटापे, बाल झड़ने, स्किन की प्रॉबलम्स में भी लाभ मिलता है।

d) अलसी के बीज हल्का भून कर खाएं अथवा सलाद या दही में मिलाकर खाएं, चाहे तो जूस में मिलाकर पियें। यह जूस के स्वाद को बिना बदले उसकी पोषकता कई गुना बढ़ा देगा। 

e) साबुत अलसी लंबे समय तक खराब नहीं होती लेकिन इसका पाउडर (Ground flax seeds) हवा में मौजूद ऑक्सीजन के प्रभाव में खराब हो जाता है, इसलिए ज़रूरत के मुताबिक अलसी को ताज़ा पीसकर ही इस्तेमाल करें। इसे अधिक मात्रा में पीसकर न रखें। 

अलसी के बीज भूनकर खाना – Roasted flax seeds in hindi

f) बहुत ज्यादा सेंकने या फ्राई करने से अलसी के बीज का फायदा, औषधीय गुण नष्ट हो सकते हैं और इसका स्वाद बिगड़ सकता है। इसलिए अलसी के बीज को इतना भूनना चाहिए कि नमी निकल जाये। 

g) व्रत में अलसी के बीज खा सकते हैं क्योंकि ये कोई अनाज नहीं है। जैसे मूंगफली का सेवन भी व्रत में किया जाता है। मूंगफली भी एक बीज है। अलसी में भरपूर पोषक तत्व होते हैं जोकि व्रत में फायदेमंद भी है। 

6) अलसी के फायदे बालों के लिए –

जैसा कि आप जानते हैं अलसी Omega 3 fatty acids का बढ़िया स्रोत है। ये फैटी एसिड्स बालों की अच्छी बढ़त के लिए जरुरी है। 

– अलसी का सेवन बालों की जड़ों से लेकर सिरों तक को पोषण देता है। इससे बाल लम्बे और मजबूत होते हैं इसलिए कम टूटते-झड़ते हैं। 

नए निकलने वाले बाल भी स्वस्थ और सुंदर होते हैं। Omega 3 fatty acids सर की स्किन को भी सूखने से बचाते हैं, जिससे डैंड्रफ यानि रूसी की समस्या भी नहीं होती। 

7) महिलाओं के लिए अलसी के फायदे – Alsi seeds benefits in hindi

– जिन औरतों का पीरियड रेगुलर नहीं होता और पीरियड के दौरान तेज दर्द रहता हो, उन्हें रोजाना अलसी खाना चाहिए। अलसी स्त्रियों के प्रजनन अंगों को स्वस्थ बनाता है, जिससे पीरियड नियमित होता है। 

– गर्भवती स्त्रियों और स्तनपान कराने वाली माताओं को अलसी का सेवन संतुलित मात्रा में करना चाहिए। अलसी के बीज स्तनपान के दौरान दूध न आने की समस्या को दूर करता है। 

आज भी शहरो और कस्बों के कई परिवारों में स्तनपान कराने वाली स्त्रियों को अलसी (तीसी) के बने लड्डू और अन्य भोज्य पदार्थ दिए जाते हैं। 

ये इस बात का सबूत है कि हमारे पूर्वज अलसी के बीज का महत्व अच्छी तरह जानते थे पर हम इन्हें भुलाकर सिर्फ दवाइयां खाने में विश्वास करने लगे। 

– अलसी के बीज औरतों के हार्मोनल बैलेंस के लिए बहुत सहायक होता है क्योंकि ये बीज Lignans का बहुत अच्छा स्रोत है जोकि Phytoestrogen और Anti-Oxidant गुणों से भरपूर है। 

– अलसी में पाए जाने वाला Phytoestrogen Adaptogenic होता है। अतः ये ऐसी महिलायें जिनके शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन बहुत ज्यादा है या जरुरत से कम है, दोनों को अलसी फायदा पहुँचाता है। 

– महिलाओं में रजोनिवृत्ति (Menopause) के दौरान होने वाली समस्याओं में भी अलसी के उपयोग से राहत मिलती है। यह देखा गया है कि माइल्ड मेनोपॉज़ की समस्या में रोजाना लगभग 40 ग्राम पिसी हुई अलसी खाने से वही लाभ प्राप्त होते हैं जो हार्मोन थैरेपी से मिलते हैं। 

8) अलसी के फायदे आँखों के लिए –

अलसी में मिलने वाला ओमेगा 3 फैटी एसिड्स तत्व नेत्र विकार, आँखों में सूखापन (Dry Eyes) के उपचार में असरदार है और डॉक्टर भी इसकी सलाह देते हैं। 

Omega 3 Fatty acids आँखों में नमी बराबर बनाये रखता है, जिससे ग्लूकोमा, High eye pressure के खतरे कम होते हैं।  

9) अलसी के आयुर्वेदिक गुण – Ayurvedic benefits of flaxseed in hindi :

आयुर्वेद में अलसी को मंद गंधयुक्त, मधुर, बलकारक, पित्तनाशक, स्निग्ध, पचने में भारी, गरम, पौष्टिक, कामोद्दीपक, किंचित कफ वात-कारक, पीठ के दर्द ओर सूजन को मिटानेवाली कहा गया है. जाड़ों में अलसी खाने से शरीर गर्म रहता है। 

– अलसी वात को संतुलित करता है, इसलिए वात बढ़ने की वजह से होने वाले विकारों का उपचार करता है। 

– अलसी के तेल को Flax seed oil या linseed oil कहते हैं।  इसमें Alpha-linolenic Acid (ALA) नामक तत्व होता है जो एक प्रकार का ओमेगा-3 फ़ैटी एसिड (omega-3 fatty acid) है, जिसके कई सारे चिकित्सकीय लाभ हैं। 

10) अलसी के गुण हार्ट के मरीज और ब्लड प्रेशर के लिए – 

– हृदय की धमनियों में कोलेस्ट्रॉल के जमने से हृदय रोग की सम्भावना बढ़ जाती है। इसलिए अलसी कोलेस्ट्रॉल कम करके हृदय रोग होने के खतरे को भी कम करता है। 

अलसी विटामिन B Complex, मैगनिशियम, मैगनीस तत्वों से भरपूर है जोकि LDL नामक बुरे कोलेस्ट्रोल को कम करते है।  अलसी के सेवन से कोलेस्ट्रॉल के लेवल में कमी आना देखा गया है। 

11) अलसी के बीज (Flax seeds in English) ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने, हाइपरटेंशन के रोगियों के लिए, ब्लड शुगर कंट्रोल में अत्यंत लाभदायक है। Type 1 और Type 2 Diabetes रोगियों के लिए अलसी डायबिटीज रोकने में कारगर पाया गया है। 

British Journal of Nutrition में प्रकाशित एक स्टडी में भाग लेने वाले लोगों के भोजन में 50 ग्राम अलसी 4 हफ्ते तक शामिल की गयी। नतीजा उनके रक्त में ब्लड शुगर लेवल की मात्रा 27 % तक कम हो गयी। 

12) अलसी किडनी से जुड़ी समस्याओं में भी लाभकारी है। अलसी के बीज गरम पानी में उबालकर इसके साथ एक तिहाई भाग मुलेठी का चूर्ण मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से खूनी दस्त और और मूत्र संबंधी रोगों में लाभ होता है।

13) अमेरिकी वैज्ञानिकों के एक शोध में पता चला है कि अलसी में जो Poly Unsaturated fatty acids होता है, वह विशेष रूप से स्तन का कैंसर, प्रोस्टेट और कोलन कैंसर (पेट के कैंसर) से बचाव करता है। 

अलसी के बीज ऑनलाइन खरीदने के लिए ये लिंक देखें > Flax Seeds

अलसी के नुक्सान, अलसी किसे नहीं खाना चाहिए – Side effects of Flaxseed in hindi  :

1. अलसी खाने से कुछ लोगों को शुरुआत में कब्ज हो सकती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अलसी के बीज में फाइबर ज्यादा होता है। इसलिए अगर आप अलसी का सेवन कर रहे हो तो पानी भरपूर पियें। सही मात्रा में अलसी खाने से कब्ज दूर होती है, लेकिन ज्यादा अलसी खाने से लूज मोशंस भी हो सकता है। 

2. प्रेगनेंसी के दौरान अलसी का सेवन डॉक्टर की सलाह लेकर 1 टेबलस्पून से अधिक नहीं करना चाहिए। बच्चा होने के बाद अलसी की बनी चीजों का सेवन निश्चिंत होकर कर सकते है। 

3. अलसी खून को पतला करती है इसलिए यदि आपको Blood Pressure की समस्या हो तो इसके सेवन से पहले डॉक्टर से एक बार सलाह लें। 

4. जरुरत से ज्यादा अलसी खाने से कुछेक लोगों को एलर्जी की शिकायत हो सकती है। इसके लक्षण हैं : पेट दर्द, उलटी, सांस लेने में दिक्कत, लो ब्लड प्रेशर आदि। 

किसी भी चीज़ की अति अच्छी नहीं होती। लेख में बताई गयी अलसी के बीज (Flaxseed) की सही मात्रा खाने से अलसी के सभी फायदों का लाभ लिया जा सकता है। 

बाल वनिता महिला आश्रम

दुनिया के अनेक देशों में अलसी के बीज या Flax seeds लोकप्रिय और सेहतमंद आहार के रूप मे जाना जाता है। 

डिस्कलेमरः खानपान, किसी आयुर्वेदिक क्रिया या औषधि को अपनाने में स्वविवेक से काम लें, अति न करें। जानकार चिकित्सक से भी सलाह लें। इस वेबसाइट के सारे लेखों का उद्देश्य केवल शैक्षिक है। 

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बुधवार, 28 अप्रैल 2021

केवल महिलाएं ही पढें ये थोड़ा… सीक्रेट है।By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब✍️ कुछ खास आप सभी 40+ के लिख रही हूँ। आजमाइए अवश्य।चूंकि प्रश्न मैंने किया था तो उत्तर तो बनता है।यदि आपकी उम्र चालीस पार पार हो गई है और आप इस सीक्रेट को छुपाए रखना रखना चाहते हैं तो आप विशिष्ट खाद्य पदार्थों जिसे सुपर फूड कहते उसे अपने आहार में सम्मिलित करिए।इस आहर के निरंतर सेवन से आपका शरीर कैंसर के विरुद्ध रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है साथ झुर्रियों से मुक्ति एवं मेटाबॉलिज्म का संतुलन बना रहता है।चलिए जानते हैं विस्तार से -रैशभरी - यह कैंसर रोधी फाइटोकेमिकल्स का कार्य करता है अपितु इस टेक्सचर वाली बेरीज के प्रति एक कप में 8 ग्राम फाइबर होता है। जो कॉन्स्टिपेशन से राहत देकर पेट भरे होने का अनुभव कराता है परिणामस्वरूप अतिरिक्त भोजन खाने से बचा जा सकता है।2. देशी अंडे - अंडे की जर्दी फेके बिना पूरे अंडे खाएं।इसमे हेल्दी फैट्स होते हैं जो आपको संपूर्ण प्रोटीन, कैल्शियम एवं विटामिन डी की पूर्ति करते हैं। जिससे पूर्णता का अनुभव कराते हैं। एवं क्रेविंग को रोकने में सहयोगी होते हैं।3. प्याज़ - कैंसर रोधी का कार्य करता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक है। जो महिलाएं इसके गंध को नापसंद करती हैं कृप्या 40+ वाली महिलाएं इसे अपने भोजन में सम्मिलित करिए।4. बादाम एक टेस्टी एवं पोर्टेबल स्नैक में हार्ट - हेल्दी मोनोअनसैचुरैटेट पॉली अनसैचुरेटेड फैट होते हैं। जो एल डी एल कॉलेस्ट्राल को संतुलित करने में सहायक होते हैं। व्यायाम करने वाली महिलाओं के वजन कम करने में सहायक होते हैं।5. पालक - विटामिन ई के साथ अमीनो एसिड बीटेन, उच्च फाइबर एवं अन्य पोषक तत्व Choline जो लीवर में फैट स्टोरिंग जीन को बंद करने का कार्य करता है।6. हल्दी - इसमें एंटीआॉक्सीडेंट पाई जाती है। जो कैंसर की सूजन से रक्षा करता है।7. शहद में कॉपर, आयरन, मैग्नीशियम, मैगनिज जिंक जैसे मिनरल्स होते हैं जिससे मस्तिष्क खुश रहता है और स्कीन ग्लो करती है। स्कीन सेल्स में युवा निखार लाती है।8. सेब - जो महिलाएं नियमित रूप से सेब खाती हैं उनमें कोरोनरी रोगों से लड़ने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है। परिणामस्वरूप 12से 23% रोगों का भय कम हो जाता है।9. तरबूज - आँखों के चारों ओर घबराहट उत्पन्न करने वाले पफीनेस को कम करता है।10. गाजर - गाजर में पाया जाने वाला विटामिन A बढ़ती उम्र में ग्लोइंग त्वचा के साथ आँखों की रौशनी में भी वृद्धि करता है। इसके अतिरिक्त यह बीटा कैरोटीन से भरपूर होता है।बाल वनिता महिला आश्रमबीटा कैरोटीन एथेरोस्क्लेरोसिस से भी बचाता है। एथेरोस्क्लेरोसिस की वजह से धमनियों में वसा और कोलेस्ट्रॉल जमा हो जाता है और इसकी वजह से किसी की मौत भी हो सकती है। अतः गाजर का सेवन अवश्यपोस्ट पढ़ने के लिए धन्यवाद। 🙏

केवल महिलाएं ही पढें ये थोड़ा… सीक्रेट है।

By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब

✍️ कुछ खास आप सभी 40+ के लिख रही हूँ। आजमाइए अवश्य।

चूंकि प्रश्न मैंने किया था तो उत्तर तो बनता है।

यदि आपकी उम्र चालीस पार पार हो गई है और आप इस सीक्रेट को छुपाए रखना रखना चाहते हैं तो आप विशिष्ट खाद्य पदार्थों जिसे सुपर फूड कहते उसे अपने आहार में सम्मिलित करिए।

इस आहर के निरंतर सेवन से आपका शरीर कैंसर के विरुद्ध रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है साथ झुर्रियों से मुक्ति एवं मेटाबॉलिज्म का संतुलन बना रहता है।

चलिए जानते हैं विस्तार से -

  1. रैशभरी - यह कैंसर रोधी फाइटोकेमिकल्स का कार्य करता है अपितु इस टेक्सचर वाली बेरीज के प्रति एक कप में 8 ग्राम फाइबर होता है। जो कॉन्स्टिपेशन से राहत देकर पेट भरे होने का अनुभव कराता है परिणामस्वरूप अतिरिक्त भोजन खाने से बचा जा सकता है।

2. देशी अंडे - अंडे की जर्दी फेके बिना पूरे अंडे खाएं।

इसमे हेल्दी फैट्स होते हैं जो आपको संपूर्ण प्रोटीन, कैल्शियम एवं विटामिन डी की पूर्ति करते हैं। जिससे पूर्णता का अनुभव कराते हैं। एवं क्रेविंग को रोकने में सहयोगी होते हैं।

3. प्याज़ - कैंसर रोधी का कार्य करता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक है। जो महिलाएं इसके गंध को नापसंद करती हैं कृप्या 40+ वाली महिलाएं इसे अपने भोजन में सम्मिलित करिए।

4. बादाम एक टेस्टी एवं पोर्टेबल स्नैक में हार्ट - हेल्दी मोनोअनसैचुरैटेट पॉली अनसैचुरेटेड फैट होते हैं। जो एल डी एल कॉलेस्ट्राल को संतुलित करने में सहायक होते हैं। व्यायाम करने वाली महिलाओं के वजन कम करने में सहायक होते हैं।

5. पालक - विटामिन ई के साथ अमीनो एसिड बीटेन, उच्च फाइबर एवं अन्य पोषक तत्व Choline जो लीवर में फैट स्टोरिंग जीन को बंद करने का कार्य करता है।

6. हल्दी - इसमें एंटीआॉक्सीडेंट पाई जाती है। जो कैंसर की सूजन से रक्षा करता है।

7. शहद में कॉपर, आयरन, मैग्नीशियम, मैगनिज जिंक जैसे मिनरल्स होते हैं जिससे मस्तिष्क खुश रहता है और स्कीन ग्लो करती है। स्कीन सेल्स में युवा निखार लाती है।

8. सेब - जो महिलाएं नियमित रूप से सेब खाती हैं उनमें कोरोनरी रोगों से लड़ने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है। परिणामस्वरूप 12से 23% रोगों का भय कम हो जाता है।

9. तरबूज - आँखों के चारों ओर घबराहट उत्पन्न करने वाले पफीनेस को कम करता है।

10. गाजर - गाजर में पाया जाने वाला विटामिन A बढ़ती उम्र में ग्लोइंग त्वचा के साथ आँखों की रौशनी में भी वृद्धि करता है। इसके अतिरिक्त यह बीटा कैरोटीन से भरपूर होता है।

बाल वनिता महिला आश्रम

बीटा कैरोटीन एथेरोस्क्लेरोसिस से भी बचाता है। एथेरोस्क्लेरोसिस की वजह से धमनियों में वसा और कोलेस्ट्रॉल जमा हो जाता है और इसकी वजह से किसी की मौत भी हो सकती है। अतः गाजर का सेवन अवश्य

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रविवार, 11 अप्रैल 2021

Sem: Charismatically Benefits Sem - By Social Worker Vanita Kasania PunjabBAL Vnita mahila ashramBeans are a type of vine, whose beans (sem phali) are used for food. Bean pod

Sem: करिश्माई ढंग से फायदा करता है सेम –  By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब

सेम एक प्रकार का लता होता है, जिसकी फलियों (sem phali) को खाने के लिए प्रयोग किया जाता है। सेम के फली में बहुत सारी पौष्टकताएं होने के कारण आयुर्वेद में सेम को औषधि के रुप में इस्तेमाल की जाती है। सेम के प्रत्येक फली में 4-5 बीज होते हैं, जो अंडाकार होती हैं। सेम का सेवन कई तरह से किया जा सकता है, वैसे ज़्यादातर लोग सेम की सब्जी (sem ki sabji) बनाकर खाते हैं। 

Sem vegetable

सेम की फली को गला और पेट का दर्द, सूजन, बुखार, अल्सर जैसे अनेक बीमारियों के उपचार के लिए प्रयोग में लाया जाता है। चलिये इसके बारे में विस्तार से जानते हैं कि सेम कितने बीमारियों के लिए फायदेमंद है-

 

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सेम क्या है? (What is Sem Phali in Hindi?)

शायद आपको पता नहीं कि वर्ण के आधार पर सेम कई प्रकार की होती हैं। इसकी लता लम्बी, जमीन पर फैलने वाली  होती है। इसकी फली 3.8-5 सेमी लम्बी, 1.2-1.8 सेमी चौड़ी, हरी अथवा बैंगनी रंग की होने के साथ आगे के भाग की ओर नुकीली होती है। बीज 2-4 की संख्या में सफेद, पीली, बैंगनी अथवा काले रंग के होती है।

सेम की फली (sem ki phali) में कॉपर, आयरन,मैग्निशियम, फॉस्फोरस, प्रोटीन, कैल्शियम आदि अनगिनत पौष्टिकताएं होती है। सेम की सब्जी (sem ki sabji) बनाकर खाने से भी कुछ हद तक इसकी पौष्टिकताओं का फायदा मिल सकता है साथ ही बीमारियों से भी राहत मिलने में मदद मिल सकती है। सेम मधुर, थोड़ा कड़वा , गर्म तासीर होने के कारण भारी भी होता है। सेम कफ , वात और पित्त को कम करने के साथ स्पर्म काउन्ट कम करता है लेकिन ब्रेस्ट का साइज बढ़ाने में मदद करता है। इसके अलावा सेम पेट फूलना, एसिडिटी तथा विष का असर कम करने वाला होता है। चलिये सेम के बारे में विस्तार से आगे जानते हैं।

अन्य भाषाओं में सेम के नाम (Name of Sem in Different Languages)

सेम की फली का वानस्पतिक नाम : Lablabpurpureus (Linn.) Sweet (लैबलैब परपूरियस)Syn-Dolichos lablab Linn है। सेम की फली Fabaceae (फैबेसी) कुल का होता है। सेम का अंग्रेजी नाम Flat Bean (फ्लैट बीन) है। लेकिन सेम को भारत के अन्य प्रांतों में भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है।

Sem beans in-

  • Sanskrit-निष्पाव, वल्लक, श्वेतशिम्बिका;
  • Hindi-निष्पाव, भटवासु, बल्लार, सेम;
  • Assamese-उरी (Uri), उरसी (urshi);
  • Kannada–अवरे (Avare);
  • Gujrati-ओलीया (Oliya), वाल (Val);
  • Tamil-मोचै (Motchai);
  • Telugu–अनुमुलु (Anumulu);
  • Bengali-मखानसिम (Makhansim), बोरबोटी (Borboti);
  • Nepali-राजसिमी (Rajsimi);
  • Punjabi-कालालोबिया (Kalalobia), कटजंग (Katjang);
  • Marathi-पाओटे (Paote), वाल (Vaal);
  • Malayalam-अमारा (Amara)।
  • English-इजिप्शियन किडनी बीन (Egyptian kidney bean), पर्पल हयासिंथ (Purple hyacinth), बोनोविस्ट बीन  (Bonovista bean), इण्डियन बीन (Indian bean), हयासिंथ बीन (Hyacinth bean);
  • Persian-लोबिया (Lobiya)।

 

सेम के फायदे (Benefits of Sem Beans in Hindi)

 अभी तक आपने सेम के बारे में बहुत कुछ जाना। लेकिन सेम के फायदों के आधार पर आयुर्वेद में कैसे औषधि के रुप में प्रयोग किया जाता है, आगे इसके बारे में जानते हैं-

 

गले का दर्द दूर करे सेम की फली ( Benefit of Sem Beans in Sore Throat in Hindi)

मौसम के बदलाव के साथ गले में दर्द , सर्दी-खांसी जैसी बहुत सारी समस्याएं होने लगती है। गले के दर्द से आराम पाने में सेम की फली (sem ki fali) का ऐसे सेवन करने पर आराम मिलता है। 5-10 मिली सेम के पत्ते के रस का सेवन करने से गले का दर्द कम होता है।

और पढ़े –  गले के  रोग में  कम्पिल्लक  के फायदे By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब

दस्त से दिलाये राहत सेम की फली (Sem ki Fali to Fight Diarrhoea in Hindi)

अगर खान-पान में बदलाव के कारण दस्त हो रहा है तो सेम के बीजों का काढ़ा बनाकर 10-30 मिली मात्रा में सेवन करने से उल्टी, दस्त, मूत्र संबंधी समस्या एवं पेट के दर्द से लाभ मिलता है।

पेट दर्द से दिलाये आराम सेम (Benefits of Sem Vegetable for Stomachalgia in Hindi)

अक्सर मसालेदार खाना खाने पर पेट में गैस हो जाता है जिसके कारण पेट में दर्द होने लगता है। सेम के पत्तों को पीसकर पेट पर लगाने से पेट का दर्द कम हो जाता है।

और पढ़े:    पेट दर्द में उस्तूखूदूस के फायदे By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब

पेट फूलने के परेशानी से दिलाये राहत सेम (Sem Beans Beneficial in Flatulance in Hindi)

अगर अपच के कारण पेट फूलने की समस्या होती है तो उसमें सेम बहुत काम आता है। सेम के बीजों को आग में भूनकर खाने से आध्मान या पेट फूलने की समस्या में लाभ होता है।

Sem ki sabji

अल्सर में फायदेमंद सेम की फली (Sem Vegetable Benefits in Ulcer in Hindi)

 सेम की फली (sem ki phali) अल्सर का घाव सूखाने में बहुत काम आता है। राजशिम्बी के बीजों को भैंस के दूध में पीसकर शाम के समय अल्सर पर लगाना चाहिए इस तरह लगाने से अल्सर का घाव शीघ्र भर जाता है; क्योंकि शाम के समय गर्मी कम होती है।

कंडू या खुजली की परेशानी करे दूर सेम की फली (Benefits of Sem Fali to Get Relief from Scabies in Hindi)

कभी-कभी एलर्जी के कारण खुजली की समस्या होती है। सेम के पत्ते के रस को खुजली वाले जगह पर लगाने से परेशानी कम होती है।

दाद की समस्या करे दूर सेम की फली (Sem Beans Benefits in Ringworm  in Hindi)

दाद की समस्या है तो वहां सेम के पत्ते का रस लगायें। इससे दाद या रिंगवर्म जल्दी ठीक होता है।


बुखार को करे कम सेम की फली (Sem Vegetable Benefits in Fever in Hindi)

सेम बीजों का काढ़ा बनाकर 15-30 मिली काढ़े में 1 ग्राम सोंठ मिलाकर पीने से ज्वर या बुखार के लाभ होता है।

सूजन में फायदेमंद सेम की फली (Sem to Treat Inflammation in Hindi)

सेम बीजों को पीसकर सूजन वाले स्थान पर लगाने से सूजन से जल्दी आराम मिलता है।

कैंसर के इलाज में लाभकारी सेम (Sem Beneficial to Treat Cancer in Hindi)

एक रिसर्च के अनुसार सेम में एंटी कैंसर  गुण होने के वजह से ये कैंसर के लक्षणों को कम करने में मदद करता है। 

 

श्वसन विकार के इलाज में लाभकारी सेम (Benefits of Sem in Breathing Disease in Hindi)

एक रिसर्च के अनुसार सेम में ऐसे गुण होते हैं जो कि रेस्पिरेटरी यानी श्वसन प्रक्रिया को स्वस्थ बनाये रखने में मदद करता है।

 

पाचन को स्वस्थ बनाये रखने में मददगार सेम ( Sem Beneficial in Digestive System in Hindi)

सेम की फली पाचन संबंधी समस्याओ में भी फायदेमंद होती है विशेषरूप से डायरिया में क्योंकि रिसर्च के अनुसार सेम में एस्ट्रिंजेंट यानि कषाय का गुण होता है जो कि डायरिया जैसी समस्याओं को दूर कर पाचन को स्वस्थ्य बनाये रखने में मदद करती है। 

 

हृदय के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद सेम (Sem Beneficial for Healthy Heart in Hindi)

एक रिसर्च के अनुसार सेम में कार्डिओवस्कुलर सिस्टम को स्वस्थ बनाये रख क हृदय संबधी रोग को दूर रखने में सहायक होती है। 

सेम की फली के उपयोगी भाग (Useful Part of Sem in Hindi)

आयुर्वेद में सेम के फली, बीज तथा पत्ते का इस्तेमाल सबसे ज्यादा किया जाता है।

sem ki phali

सेम की फली का सेवन कैसे करना चाहिए (How to Consume Sem Beans in Hindi)

बीमारी के लिए सेम के सेवन और इस्तेमाल का तरीका पहले ही बताया गया है। इसके अलावा आप सेम की सब्जी (Sem ki sabji) बनाकर इसका सेवन कर सकते हैं। अगर आप किसी ख़ास बीमारी के इलाज के लिए सेम का उपयोग कर रहे हैं तो आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह ज़रूर लें। चिकित्सक के परामर्श के अनुसार-

–15-30 मिली काढ़ा

–5-10 मिली रस का प्रयोग कर सकते हैं।

सेम की फली कहां पाई और उगाई जाती है (Where Sem Beans is Found or Grown in Hindi)

समस्त भारत में इसकी खेती की जाती है तथा इसकी फलियों का प्रयोग साग के रूप में किया जाता है। 

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

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ਣ ਯੋਗ ਬਣਾ ਸਕਦੇ ਹਨ

ਸਮੁੰਦਰੀ ਪਾਣੀ ਤੋਂ ਲੂਣ ਕੱ Remਣਾ ਇਕ ਵੱਡੀ ਚੁਣੌਤੀ ਹੈ. ਖੋਜਕਰਤਾਵਾਂ ਕੋਲ ਇਸ ਦਾ ਜਵਾਬ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ - ਪਰ ਇਸ ਨੂੰ ਪੂਰੀ ਪ੍ਰੋਸੈਸਿੰਗ ਸ਼ਕਤੀ ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ ਹੋਏਗੀ. By Vnita Kasnia Punjab

ਰੇਨੇ ਚੁਨਅਲੇਕਸਸੈਂਡਰ ਨੋਏ ਕੋਲ ਬਹੁਤ ਛੋਟੇ ਸਾਧਨ ਲਈ ਵੱਡੀਆਂ ਯੋਜਨਾਵਾਂ ਹਨ. ਲਾਰੈਂਸ ਲਿਵਰਮੋਰ ਨੈਸ਼ਨਲ ਲੈਬਾਰਟਰੀ ਦੇ ਇਕ ਸੀਨੀਅਰ ਖੋਜ ਵਿਗਿਆਨੀ, ਨੋਏ ਨੇ ਆਪਣੇ ਕੈਰੀਅਰ ਦਾ ਇਕ ਮਹੱਤਵਪੂਰਣ ਹਿੱਸਾ ਉਸ ਤਰਲ ਦੀ ਅਲਮੀਕੀ ਨੂੰ ਸੰਪੂਰਨ ਕਰਨ ਲਈ ਸਮਰਪਿਤ ਕੀਤਾ ਹੈ - ਜਿਸ ਨੂੰ ਸਮੁੰਦਰੀ ਪਾਣੀ ਤੋਂ ਲੂਣ ਹਟਾਉਣਾ ਹੈ. ਉਸਦਾ ਸਟਾਕ-ਇਨ-ਟ੍ਰੇਡ ਕਾਰਬਨ ਨੈਨੋਟਿ .ਬ ਹੈ. 2006 ਵਿਚ, ਨਈਏ ਨੇ ਇਕ ਕੱਟੜ ਸਿਧਾਂਤ ਨੂੰ ਅਪਣਾਉਣ ਦੀ ਬੇਚੈਨੀ ਮਹਿਸੂਸ ਕੀਤੀ: ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ ਕਿ ਨੈਨੋਟਿesਬਜ਼ - ਇੰਨੇ ਛੋਟੇ ਸਿਲੰਡਰ, ਉਹ ਸਿਰਫ ਇਕ ਇਲੈਕਟ੍ਰੋਨ ਮਾਈਕਰੋਸਕੋਪ ਨਾਲ ਵੇਖੇ ਜਾ ਸਕਦੇ ਹਨ - ਇਹ ਫਿਲਟਰ ਫਿਲਟਰਾਂ ਵਜੋਂ ਕੰਮ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਨ. ਇਹ ਇਸ ਗੱਲ ਤੇ ਨਿਰਭਰ ਕਰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਟਿ howਬਾਂ ਕਿੰਨੀਆਂ ਚੌੜੀਆਂ ਸਨ. ਉਦਘਾਟਨ ਨੂੰ ਪਾਣੀ ਦੇ ਅਣੂਆਂ ਨੂੰ ਲੰਘਣ ਦੇ ਲਈ ਕਾਫ਼ੀ ਵੱਡਾ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਸੀ ਪਰ ਸਮੁੰਦਰੀ ਪਾਣੀ ਨੂੰ ਘਟਾਉਣਯੋਗ ਬਣਾਉਣ ਵਾਲੇ ਵੱਡੇ ਲੂਣ ਦੇ ਕਣਾਂ ਨੂੰ ਰੋਕਣ ਲਈ ਇਹ ਬਹੁਤ ਘੱਟ ਸੀ. ਕਾਫ਼ੀ ਕਾਰਬਨ ਨੈਨੋਟਿesਬਸ ਇਕੱਠੇ ਰੱਖੋ ਅਤੇ ਤੁਹਾਡੇ ਕੋਲ ਸਾਫ ਪਾਣੀ ਬਣਾਉਣ ਲਈ ਦੁਨੀਆ ਦੀ ਸਭ ਤੋਂ ਕੁਸ਼ਲ ਮਸ਼ੀਨ ਹੈ.

ਕਾਰਬਨ ਨੈਨੋਟਿesਬ ਕਿੰਨੇ ਛੋਟੇ ਹਨ?

ਮੱਕੜੀ ਦੇ ਧਾਗੇ ਦੀ ਚੌੜਾਈ

4,000 ਨੈਨੋਮੀਟਰ

50 ਕਾਰਬਨ ਨੈਨੋਟਿesਬਜ਼

0.8 ਨੈਨੋਮੀਟਰ ਹਰੇਕ

ਲੈਬ ਵਿਚ ਉਸ ਦੇ ਬਹੁਤੇ ਸਹਿਕਰਮੀਆਂ ਨੇ ਇਸ ਵਿਚਾਰ ਨੂੰ ਵਿਗਿਆਨਕ ਕਿਹਾ ਸੀ. ਨਯੀ ਕਹਿੰਦੀ ਹੈ, “ਪਾਣੀ ਇੰਨੀਆਂ ਛੋਟੀਆਂ ਛੋਟੀਆਂ ਟਿ .ਬਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਲੰਘ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਬਾਰੇ ਕਲਪਨਾ ਕਰਨਾ hardਖਾ ਸੀ। ਪਰ ਜੇ ਨੈਨੋਟਿ theoryਬ ਥਿ .ਰੀ ਸਹੀ ਸੀ, ਤਾਂ ਲਾਭ ਅਣਗਿਣਤ ਹੋਣਗੇ. ਦੁਨੀਆ ਦੇ ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਖੇਤਰ ਇਸ ਸਮੇਂ ਪੀਣ ਵਾਲੇ ਪਾਣੀ ਦੀ ਘਾਟ ਦੇ ਘੇਰੇ ਵਿਚ ਹਨ, ਜਿਸ ਵਿਚ 1.2 ਅਰਬ ਲੋਕ- ਵਿਸ਼ਵਵਿਆਪੀ ਆਬਾਦੀ ਦਾ ਲਗਭਗ ਛੇਵਾਂ ਹਿੱਸਾ- ਪਾਣੀ ਦੀ ਘਾਟ ਵਾਲੇ ਖੇਤਰਾਂ ਵਿਚ ਜੀ ਰਹੇ ਹਨ. ਡੀਸੀਲਿਨੇਸ਼ਨ ਮਦਦ ਕਰ ਸਕਦੀ ਹੈ, ਪਰ ਅੱਜ ਉਸ ਜਗ੍ਹਾ ਦੇ ਬੁਨਿਆਦੀ ਾਂਚੇ ਲਈ ਸਮੁੰਦਰੀ ਪਾਣੀ ਨੂੰ ਗਰਮ ਕਰਨ ਜਾਂ ਇਸ ਨੂੰ ਗੁੰਝਲਦਾਰ ਫਿਲਟਰਾਂ ਰਾਹੀਂ ਮਜਬੂਰ ਕਰਨ ਲਈ ਭਾਰੀ ਮਾਤਰਾ ਵਿਚ energyਰਜਾ (ਅਤੇ ਇਸ ਲਈ ਪੈਸਾ) ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ ਹੈ. ਜੇ ਨੈਨੋਟਿ filਬ ਫਿਲਟਰ ਕੰਮ ਕਰਦੇ, ਤਾਂ ਉਹ ਵਿਸ਼ਵ ਦੇ ਪਾਣੀ ਦੀਆਂ ਮੁਸੀਬਤਾਂ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਘਟਾ ਸਕਦੇ ਹਨ.

ਨੋਈ ਦੀ ਟੀਮ ਨੇ ਇਕ ਸਧਾਰਣ ਫਿਲਟ੍ਰੇਸ਼ਨ ਪ੍ਰਯੋਗ ਸਥਾਪਤ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਇਸ ਨੂੰ ਰਾਤੋ ਰਾਤ ਚੱਲਣ ਦਿਓ. ਸਵੇਰੇ, ਦੋ ਸਹਾਇਕਾਂ ਨੇ ਲੈਬ ਦੇ ਫਰਸ਼ ਉੱਤੇ ਇੱਕ ਛੱਪੜ ਵੇਖਿਆ; ਨੈਨੋਟਿesਬਾਂ ਵਿਚੋਂ ਪਾਣੀ ਇੰਨੀ ਤੇਜ਼ੀ ਨਾਲ ਖਿਸਕ ਗਿਆ ਸੀ ਕਿ ਛੋਟੇ ਜਲ ਭੰਡਾਰ ਦਾ ਮਤਲਬ ਤਰਲ ਨੂੰ ਫੜਨਾ ਪਿਆ ਸੀ. ਖੋਜਕਰਤਾ ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਇਸ ਗੱਲ ਦੀ ਪੁਸ਼ਟੀ ਕਰਨਗੇ ਕਿ ਕਾਰਬਨ ਨੈਨੋਟਿesਬਜ਼ ਦੁਆਰਾ ਪਾਣੀ ਦੇ ਵਹਾਅ ਦੀ ਦਰ ਅੱਜ ਦੇ ਡੀਸੀਲੀਨੇਸ਼ਨ ਪਲਾਂਟਾਂ ਵਿੱਚ ਵਰਤੇ ਜਾਣ ਵਾਲੇ ਫਿਲਟਰਾਂ ਨਾਲੋਂ ਛੇ ਗੁਣਾ ਵਧੇਰੇ ਹੈ।

ਉਹ ਛੱਪੜਾ ਸ਼ਾਇਦ ਛੋਟਾ ਰਿਹਾ, ਪਰ ਇਹ ਨੋਈ ਦੇ ਕਰੀਅਰ ਦੀ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਖੋਜ ਸੀ. ਉਹ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ: “ਤਜਰਬਾ ਬਹੁਤ ਹੀ ਦਿਲਚਸਪ ਸੀ, ਕਿਉਂਕਿ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦਾ ਸੀ ਕਿ ਕੀ ਉਮੀਦ ਕਰਨੀ ਹੈ।” ਹੁਣ ਜਦੋਂ ਹਰ ਕੋਈ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਇਕ ਵੱਡੀ ਚੁਣੌਤੀ ਅਜੇ ਵੀ ਬਣੀ ਹੋਈ ਹੈ - ਜੋ ਕਿ ਸ਼ਾਇਦ ਕੰਪਿutingਟਿੰਗ ਦੀ ਕਾਫ਼ੀ ਤਾਕਤ ਦੇ ਨਾਲ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕਰਨਾ ਸੰਭਵ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ.

ਖੁਸ਼ਕਿਸਮਤੀ ਨਾਲ, ਵਿਗਿਆਨੀ ਇਕ ਸਫਲਤਾ ਦੇ ਕਿਨਾਰੇ 'ਤੇ ਹਨ ਜਿਸ ਨੂੰ ਐਕਸੈਸੈਲ ਕੰਪਿ inਟਿੰਗ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ (ਜੋ ਕਿ ਗੂਗਲ ਦੇ ਕੇਸ ਵਿਚ ਬੱਦਲ ਵਿਚ ਜੁੜੀਆਂ ਮਸ਼ੀਨਾਂ ਦੀ ਭੀੜ Vnita punjab ਤੋਂ ਆਉਣ ਦੀ ਸੰਭਾਵਨਾ ਹੈ ). ਐਕਸੈਸਲ ਅੱਜ ਦੇ ਸਭ ਤੋਂ ਸ਼ਕਤੀਸ਼ਾਲੀ ਸੁਪਰ ਕੰਪਿutersਟਰਾਂ ਨੂੰ ਖੁਰਦਗੀ. ਇਸ ਕਿਸਮ ਦੀ ਅਤਿਅੰਤ ਪ੍ਰੋਸੈਸਿੰਗ ਸ਼ਕਤੀ ਖੋਜਕਰਤਾਵਾਂ ਲਈ ਇੱਕ ਵੱਡੀ ਸੰਪਤੀ ਹੋਵੇਗੀ ਜੋ ਇਹ ਜਾਣਦੀ ਹੈ ਕਿ ਨੈਨੋਟਿ -ਬਾਂ ਨੂੰ ਵੱਡੇ ਪੱਧਰ ਦੇ ਪਾਣੀ ਦੇ ਫਿਲਟਰਾਂ ਦਾ ਕੰਮ ਕਿਵੇਂ ਕਰਨਾ ਹੈ. ਇਹ ਟਿ .ਬਾਂ ਅਤੇ ਅਰਬਾਂ ਦੇ ਅਣੂ ਜੋ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਲੰਘਦੇ ਹਨ - ਵਿਸਥਾਰ ਵਿੱਚ ਅਧਿਐਨ ਕਰਨ ਲਈ ਬਹੁਤ ਘੱਟ ਹਨ, ਅਤੇ ਭੌਤਿਕ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਵੱਖੋ ਵੱਖਰੀਆਂ ਕਿਸਮਾਂ ਦੀ ਜਾਂਚ ਕਰਨਾ ਮੁਸ਼ਕਲ ਅਤੇ ਸਮੇਂ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ. ਐਕਸੈਸਲ ਕੰਪਿ computerਟਰ ਮਾਡਲਿੰਗ ਉਨ੍ਹਾਂ ਛੋਟੇ ਟਿ .ਬਾਂ ਨੂੰ ਤਿੱਖੀ ਫੋਕਸ ਵਿੱਚ ਪਾ ਦੇਵੇਗੀ, ਜੋ ਨਾਟਕੀ ubeੰਗ ਨਾਲ ਨੈਨੋਟਿ desਬ ਨਿਰਮਾਣ ਖੋਜ ਨੂੰ ਤੇਜ਼ ਕਰੇਗੀ. ਦਰਅਸਲ, ਇਹ ਟੈਕਨੋਲੋਜੀ ਅੱਜ ਦੀਆਂ ਸਭ ਤੋਂ ਪਿਆਰੀਆਂ ਵਾਤਾਵਰਣ ਦੀਆਂ ਸਮੱਸਿਆਵਾਂ ਨਾਲ ਨਜਿੱਠਣ ਵਿੱਚ ਸਹਾਇਤਾ ਕਰੇਗੀ.

ਐਕਸਕਲੈਸਲ ਪਾਵਰ ਦਾ ਵਾਅਦਾ

ਬਹੁਤ ਜ਼ਿਆਦਾ ਗਤੀ ਇੱਕ ਵਾਰ ਅਸੰਭਵ ਚੁਣੌਤੀਆਂ ਨੂੰ ਪਾਰ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਮਦਦ ਕਰ ਸਕਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਵੱਡੀਆਂ ਸਫਲਤਾਵਾਂ ਲਿਆ ਸਕਦੀ ਹੈ.

  • ਡਰੱਗ ਖੋਜ ਚਿੱਤਰ
    ਡਰੱਗ ਡਿਸਕਵਰੀ

    ਕਲਪਨਾ ਕਰੋ ਕਿ ਹਰ ਇਕ ਵਿਅਕਤੀ ਲਈ ਸਹੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦਾ ਇਲਾਜ਼ ਲੱਭਣ ਲਈ ਇਕ ਖਰਬ ਦੇ ਨਸ਼ਿਆਂ ਦੇ ਸੰਜੋਗਾਂ ਵਿਚੋਂ ਕੱ .ਣਾ.

  • ਮੌਸਮ ਦੀ ਭਵਿੱਖਬਾਣੀ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਚਿੱਤਰ
    ਮੌਸਮ ਦੀ ਭਵਿੱਖਬਾਣੀ

    ਮੌਸਮ ਵਿਗਿਆਨੀ ਗੰਭੀਰ ਮੌਸਮ ਦੇ ਰਸਤੇ ਵਿਚ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਵੱਧ ਤੋਂ ਵੱਧ ਚਾਰ ਹਫ਼ਤਿਆਂ ਦਾ ਨੋਟਿਸ ਦੇਣ ਲਈ ਅੰਕੜਿਆਂ ਦੇ ਰੀਮਾਂਸ ਨੂੰ ਘਟਾ ਸਕਦੇ ਹਨ.

  • ਭਾਸ਼ਾ ਅਨੁਵਾਦ ਚਿੱਤਰ
    ਭਾਸ਼ਾ ਅਨੁਵਾਦ

    ਰੀਅਲ-ਟਾਈਮ ਭਾਸ਼ਾ ਅਨੁਵਾਦ ਸਮਾਰਟਫੋਨਜ਼ ਵਿਚ ਇਕ ਆਮ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ਤਾ ਬਣ ਸਕਦੀ ਹੈ.

ਉਨ੍ਹਾਂ ਲਈ ਜੋ ਸਿਲਿਕਨ ਵੈਲੀ ਦੇ ਸ਼ਿਕੰਜੇ ਵਿਚ ਨਿਪੁੰਨ ਨਹੀਂ ਹਨ, ਐਕਸੈਸਕੈਲ ਸੁਪਰ ਕੰਪਿ superਟਰਾਂ ਦੀ ਅਗਲੀ ਪੀੜ੍ਹੀ ਦੁਆਰਾ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਹਾਰਸ ਪਾਵਰ ਨੂੰ ਦਰਸਾਉਂਦਾ ਹੈ. ਇਕ ਐਕਸੈਸਕਲ ਮਸ਼ੀਨ ਵਿਚ ਪ੍ਰਤੀ ਸਕਿੰਟ ਕੁਇੰਟਲਿਅਨ (ਇਕ ਅਰਬ ਅਰਬ) ਦੀ ਗਣਨਾ ਨੂੰ ਖਤਮ ਕਰਨ ਦੀ ਯੋਗਤਾ ਹੋਵੇਗੀ. ਇਹ ਚੀਨ ਦੇ ਸਨਵੇ ਟਾਈਹੁਲਾਈਟ ਨਾਲੋਂ ਲਗਭਗ 11 ਗੁਣਾ ਜ਼ਿਆਦਾ ਸ਼ਕਤੀਸ਼ਾਲੀ ਹੈ , ਜੋ ਕਿ ਅੱਜ ਵਰਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਸਭ ਤੋਂ ਤੇਜ਼ ਕੰਪਿ computerਟਰ ਹੈ. ਲਗਭਗ 50 ਮਿਲੀਅਨ ਟੀਥਰਡ ਲੈਪਟਾਪਾਂ ਦੀ ਪ੍ਰੋਸੈਸਿੰਗ ਪਾਵਰ ਵਜੋਂ ਐਕਸੈਸਲ ਬਾਰੇ ਸੋਚੋ.

ਪਹਿਲੀ ਵਿਸ਼ਵਵਿਆਪੀ ਮਸ਼ੀਨ ਬਣਾਉਣ ਲਈ ਵਿਸ਼ਵਵਿਆਪੀ ਦੌੜ ਜਾਰੀ ਹੈ, ਜੋ ਵਿਗਿਆਨੀ ਸਿਧਾਂਤਕ ਭੌਤਿਕ ਵਿਗਿਆਨ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਲੰਬੇ ਸਮੇਂ ਦੇ ਮੌਸਮ ਦੀ ਭਵਿੱਖਬਾਣੀ ਤੱਕ ਹਰ ਚੀਜ਼ 'ਤੇ ਮੁੜ ਵਿਚਾਰ ਕਰਨ ਦੇ ਯੋਗ ਕਰੇਗੀ. ਪਰ ਨੈਨੋਟਿesਬਜ਼ ਨੂੰ ਸਮਝਣ ਲਈ ਨਯੋ ਦੀ ਖੋਜ ਵਰਗੀ ਖੋਜ ਸੰਭਾਵਤ ਤੌਰ ਤੇ ਵਧ ਰਹੀ ਕੰਪਿutingਟਿੰਗ ਸਮਰੱਥਾ ਦੇ ਫਾਇਦਿਆਂ ਨੂੰ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰਨ ਲਈ ਕੁਝ ਪਹਿਲੇ ਪ੍ਰੋਜੈਕਟ ਹੋਣਗੇ.

ਗੂਗਲ ਦਿਮਾਗ ਦੀ ਟੀਮ ਦੇ ਇਕ ਖੋਜ ਵਿਗਿਆਨੀ ਜੋਰਜ ਡੈੱਲ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ, “ਕੰਪਿ compਟੇਸ਼ਨ ਸ਼ਕਤੀ ਵਿਚ ਛਾਲ ਮਾਰਨ ਨਾਲ ਪਦਾਰਥ ਵਿਗਿਆਨ, ਨਸ਼ੀਲੇ ਪਦਾਰਥਾਂ ਦੀ ਖੋਜ ਅਤੇ ਰਸਾਇਣ ਲਈ ਬਹੁਤ ਵੱਡਾ ਲਾਭ ਹੋਵੇਗਾ। ਖੋਜ ਦੇ ਇਹ ਸਾਰੇ ਖੇਤਰ, ਡਾਹਲ ਦੱਸਦੇ ਹਨ, ਅਣੂ ਦੇ ਕੰਪਿ computerਟਰ ਮਾਡਲਾਂ ਬਣਾਉਣ ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ ਹੈ — ਅਜਿਹੀ ਕਿਰਿਆ ਜੋ ਬਹੁਤ ਸਾਰੀ ਪ੍ਰੋਸੈਸਿੰਗ ਸ਼ਕਤੀ ਦੀ ਮੰਗ ਕਰਦੀ ਹੈ. ਡਾਹਲ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ, “ਇਹ ਬਹੁਤ ਹੌਲੀ ਗਣਨਾ ਹਨ, ਹਰ ਇਕ ਅਣੂ ਜਾਂ ਪਦਾਰਥ ਲਈ ਜਿਸਦਾ ਅਸੀਂ ਵਿਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਕਰਨਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਾਂ।”

ਪਰ ਹੋਰ ਵੀ ਹੈ, ਉਹ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ. ਜੇ ਤੁਸੀਂ ਮਸ਼ੀਨ ਲਰਨਿੰਗ ਨੂੰ ਲਾਗੂ ਕਰਦੇ ਹੋ - ਜੋ ਕੰਪਿ compਟਿੰਗ ਪਾਵਰ ਵਿਚ ਤਰੱਕੀ ਤੋਂ ਵੀ ਲਾਭ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ lec ਅਣੂ ਸਿਮੂਲੇਟਾਂ ਨੂੰ, ਤਾਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਵਧਦੀ ਸ਼ਕਤੀ ਦੀ ਇਕ ਦੂਹਰੀ ਝਟਕਾ ਮਿਲੇਗੀ. “ਤੁਸੀਂ ਸਾਰੀ ਨਵੀਂ ਸਮੱਗਰੀ ਨੂੰ ਲੱਭਣ ਲਈ ਸਮਗਰੀ ਵਿਗਿਆਨ ਦੇ ਨਾਲ ਮਿਲ ਕੇ ਮਸ਼ੀਨ ਲਰਨਿੰਗ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹੋ.”

ਇਹ ਬਿਲਕੁਲ ਤਰੱਕੀ ਦੀਆਂ ਕਿਸਮਾਂ ਹਨ ਜੋ ਕਿ ਇੱਕ ਵਧੀਆ, ਘੱਟ ਮਹਿੰਗੇ ਨਮਕ ਦੇ ਪਾਣੀ ਦੇ ਫਿਲਟਰ ਲਈ ਅਗਵਾਈ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ. ਅਤੇ ਇਹ ਇਕੋ ਇਕ ਰਸਤਾ ਨਹੀਂ ਹੈ ਕਿ ਅਸਮਾਨੀ ਪੱਧਰ ਦੀ ਕੰਪਿutingਟਿੰਗ ਧਰਤੀ ਦੇ ਪਾਣੀ ਦੀਆਂ ਚੁਣੌਤੀਆਂ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਕਰ ਸਕਦੀ ਹੈ.

ਕਿਉਂਕਿ ਐਕਸੈਸਕਲ ਕੰਪਿutingਟਿੰਗ ਡਾਟਾ ਦੀ ਮਹੱਤਵਪੂਰਣ ਮਾਤਰਾ ਨੂੰ ਪ੍ਰੋਸੈਸ ਕਰਨ ਵਿਚ ਵੀ ਅਸਧਾਰਨ ਹੋਏਗੀ, ਇਹ ਕੰਮ ਇੰਜਨੀਅਰਿੰਗ ਪਲੇਟਫਾਰਮ ਦੇ ਕੋਫਾerਂਡਰ, ਗੂਗਲ ਇੰਜੀਨੀਅਰ ਨੋਏਲ ਗੋਰਲਿਕ ਅਤੇ ਟਾਇਲਰ ਇਰਿਕਸਨ, ਜੋ ਇਕ ਸੀਨੀਅਰ ਡਿਵੈਲਪਰ ਐਡਵੋਕੇਟ ਕੇਂਦ੍ਰਤ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ, ਦੁਆਰਾ ਕੀਤੇ ਜਾ ਰਹੇ ਕੰਮਾਂ ਵਰਗੇ ਪ੍ਰੋਜੈਕਟਾਂ ਵਿਚ ਸਹਾਇਤਾ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ. ਪਲੇਟਫਾਰਮ ਲਈ ਪਾਣੀ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਵਿਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਤੇ. ਕਲਾਉਡ-ਅਧਾਰਤ ਪਲੇਟਫਾਰਮ ਆਲਮੀ ਪੱਧਰ 'ਤੇ ਵਾਤਾਵਰਣ ਦੇ ਅੰਕੜਿਆਂ ਦਾ ਵਿਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਕਰਦਾ ਹੈ. ਗੋਰੇਲਿਕ ਅਤੇ ਯੂਰਪੀਅਨ ਕਮਿਸ਼ਨ ਦੇ ਸਾਂਝੇ ਰਿਸਰਚ ਸੈਂਟਰ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਤਾਜ਼ਾ ਅਭਿਲਾਸ਼ਾ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਨੇ ਦੁਨੀਆ ਭਰ ਵਿੱਚ ਧਰਤੀ ਦੇ ਪਾਣੀ ਦੇ ਉੱਚ-ਰੈਜ਼ੋਲੇਸ਼ਨ ਨਕਸ਼ੇ ਬਣਾਉਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕੀਤੀ। ਧਰਤੀ ਇੰਜਨ ਦੇ ਅੰਕੜਿਆਂ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕਰਦਿਆਂ 30 ਤੋਂ ਵੱਧ ਸਾਲਾਂ ਦੇ ਸੈਟੇਲਾਈਟ ਚਿੱਤਰਾਂ ਨੂੰ ਵੇਖਦਿਆਂ, ਟੀਮ ਨੇ ਦਹਾਕਿਆਂ ਤੋਂ ਧਰਤੀ ਦੇ ਪਾਣੀਆਂ ਦੇ ਵਿਕਾਸ ਨੂੰ ਮੈਪ ਕੀਤਾ (ਅਤੇ ਮਾਪਿਆ), ਅਲੋਪ ਝੀਲਾਂ ਅਤੇ ਸੁੱਕੀਆਂ ਨਦੀਆਂ ਦੇ ਨਾਲ ਨਾਲ ਨਵੇਂ ਪਾਣੀ ਦੇ ਗਠਨ ਦਾ ਪ੍ਰਗਟਾਵਾ ਕੀਤਾ. ਸਰੀਰ. ਇਹ ਜ਼ਰੂਰੀ ਡਾਟਾ ਡਾ downloadਨਲੋਡ ਕਰਨ ਵਿਚ ਸਿਰਫ ਤਿੰਨ ਸਾਲ ਲੱਗ ਗਏ ਸਨ, ਜੇ ਇਹ ਇਕੋ ਸਮੇਂ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੁੰਦਾ. ਇਰਿਕਸਨ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਇਹ ਬਿਲਕੁਲ ਇਕ ਪੁਰਾਲੇਖ ਹੈ, ਪਰ ਐਕਸੈਸਲ ਟੀਮ ਨੂੰ ਹੋਰ ਵੀ ਵਧੇਰੇ ਜਾਣਕਾਰੀ ਇਕੱਤਰ ਕਰਨ ਦੀ ਆਗਿਆ ਦੇਵੇਗਾ - ਇਕ ਬਹੁਤ ਤੇਜ਼ ਰਫਤਾਰ ਤੇ - ਹੋਰ ਸਹੀ ਨਕਸ਼ੇ ਤਿਆਰ ਕਰਨ ਲਈ.

ਈਰਿਕਸਨ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ, "ਹੋਰ ਵੀ ਡੇਟਾ ਸਰੋਤ ਹਨ ਜੋ ਅਸੀਂ ਵੇਖ ਸਕਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਕੀ ਸਾਡੇ ਕੋਲ ਵਧੇਰੇ ਪ੍ਰੋਸੈਸਿੰਗ ਸ਼ਕਤੀ ਹੈ." ਉਹ ਦੱਸਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇਕ ਐਕਸੈਸਕਲ ਮਸ਼ੀਨ ਦੁਨੀਆ ਦੇ ਸਭ ਤੋਂ ਘੱਟ ਮੁੱਲ ਵਾਲੇ ਸਰੋਤ: ਨਾਗਰਿਕ ਵਿਗਿਆਨੀ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕਰਨ ਦੀ ਸਮਰੱਥਾ ਰੱਖਦੀ ਹੈ. ਕਲਪਨਾ ਕਰੋ ਕਿ ਜੇ ਪਾਣੀ ਦੇ ਮੈਪਿੰਗ ਪ੍ਰਾਜੈਕਟ ਨੂੰ ਖੋਲ੍ਹਿਆ ਗਿਆ, ਤਾਂ ਕਹੋ, ਕੋਈ ਵੀ ਡਰੋਨ ਉਡਾ ਰਿਹਾ ਹੈ ਜੋ ਐਚਡੀ ਵੀਡੀਓ ਨੂੰ ਸ਼ੂਟ ਕਰਦਾ ਹੈ. "ਇਹ ਡੇਟਾ ਦੀ ਇੱਕ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਮਾਤਰਾ ਹੋਵੇਗੀ," ਉਹ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ. ਹਾਈ ਸਕੂਲ ਦੇ ਬੱਚੇ ਡੀਜੇਆਈ ਫੈਂਟਮਜ਼ ਨੂੰ ਦਰਿਆਵਾਂ ਅਤੇ ਸਮੁੰਦਰੀ ਜ਼ਹਾਜ਼ਾਂ ਤੇ ਪਾਇਲਟ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ, ਗੂਗਲ ਕਲਾਉਡ ਤੇ ਵੀਡੀਓ ਅਪਲੋਡ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਨ, ਜਿੱਥੇ ਐਕਸਕਲੈਸ ਪਾਵਰ ਦੀ ਬਦੌਲਤ ਇਸ ਨੂੰ ਦਾਇਰ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਦੁਨੀਆ ਦੇ ਗੂਗਲ ਦੇ ਬੇਸ ਮੈਪ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਭੂ-ਹਵਾਲਾ ਦਿੱਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਵਿਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਡਿਜੀਟਲ ਕਾਰਟੋਗ੍ਰਾਫੀ ਵਿੱਚ ਕੱ disਿਆ ਗਿਆ ਹੈ. ਵਿਗਿਆਨ ਦਾ ਇਹ ਲੋਕਤੰਤਰਕਰਣ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਯੋਜਨਾਬੰਦੀ, ਤਬਾਹੀਆਂ ਲਈ ਖੇਤਰ ਤਿਆਰ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਨ, ਜਾਂ ਵਾਤਾਵਰਣ ਵਿਚ ਤਬਦੀਲੀਆਂ ਦੀ ਨਿਗਰਾਨੀ ਵਿਚ ਸਹਾਇਤਾ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਨ. (ਹੋਰਨਾਂ ਸੰਗਠਨਾਂ ਵਿੱਚ ਇਸੇ ਤਰਾਂ ਦੇ ਪ੍ਰੋਜੈਕਟਾਂ ਨੂੰ ਉਤਸ਼ਾਹਤ ਕਰਨ ਲਈ,ਗੂਗਲ ਅਰਥ ਇੰਜਨ ਪਲੇਟਫਾਰਮ .)

ਡਾਹਲ, ਉਸਦੇ ਹਿੱਸੇ ਲਈ, ਤੇਜ਼ੀ ਨਾਲ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ ਕਿ ਪ੍ਰੋਸੈਸਿੰਗ ਸ਼ਕਤੀ ਵਿੱਚ ਛਲਾਂਗਣ ਹਰੇਕ ਕੰਪਿutingਟਿੰਗ ਚੁਣੌਤੀ ਨੂੰ ਹੱਲ ਨਹੀਂ ਕਰੇਗੀ. ਪਰ, ਉਹ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਧ ਲਾਭ ਉਨ੍ਹਾਂ ਉਪਯੋਗਾਂ ਤੋਂ ਹੋ ਸਕਦੇ ਹਨ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਅਸੀਂ ਕਲਪਨਾ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ. ਉਹ ਮਾਈਕਰੋਸਕੋਪ ਦੀ ਕਾvention ਦੀ ਤੁਲਨਾ ਕਰਦਾ ਹੈ — ਇਹ ਇਕ ਅਜਿਹਾ ਉਪਕਰਣ ਜਿਸ ਨਾਲ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦੀਆਂ ਨਵੀਆਂ ਖੋਜਾਂ ਹੋ ਸਕੀਆਂ. “ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ ਕਿ ਕੁਝ ਅਜਿਹਾ ਹੋਵੇ ਜਿਸ ਬਾਰੇ ਅਸੀਂ ਕਦੇ ਸੋਚਿਆ ਹੀ ਨਹੀਂ ਸੀ ਕਿ ਅਚਾਨਕ ਵਿਹਾਰਕ ਬਣ ਜਾਵੇਗਾ,” ਉਹ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ. "ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਸਾਨੂੰ ਮਾਈਕਰੋਸਕੋਪ ਵਰਗਾ ਕੁਝ ਬਣਾਉਣ ਦੇਵੇਗਾ - ਇਹ ਇਕ ਨਵਾਂ ਨਵਾਂ ਸਾਧਨ ਹੈ, ਜੋ ਬਦਲੇ ਵਿਚ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਨਵੀਂਆਂ ਖੋਜਾਂ ਦੇ ਯੋਗ ਬਣਾਉਂਦਾ ਹੈ."

ਧਰਤੀ ਦਾ ਪਾਣੀ ਦਾ ਸਿਰਫ 3 ਪ੍ਰਤੀਸ਼ਤ ਤਾਜ਼ਾ ਅਤੇ ਪੀਣ ਯੋਗ ਹੈ

ਅਤੇ ਅਸੀਂ ਸਿਰਫ ਉਸ ਦੇ ਛੋਟੇ ਜਿਹੇ ਹਿੱਸੇ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚ ਸਕਦੇ ਹਾਂ.
ਤਾਜ਼ੇ ਪਾਣੀ ਦੀ ਕੁੱਲ ਮਾਤਰਾ. ਬਦਕਿਸਮਤੀ ਨਾਲ, ਇਹ ਲਗਭਗ ਸਾਰਾ ਗਲੇਸ਼ੀਅਰਾਂ, ਪੋਲਰ ਆਈਸ ਕੈਪਸ ਅਤੇ ਡੂੰਘੀ ਭੂਮੀਗਤ ਵਿੱਚ ਫਸਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ.

ਉੱਚ-ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਵਾਲੀ ਕੰਪਿ compਟਿੰਗ ਨੂੰ FLOPS ਵਿੱਚ ਮਾਪਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ. ਇਹ ਮੀਟ੍ਰਿਕ ਕਿਸੇ ਵੀ ਮਸ਼ੀਨ ਤੇ ਲਾਗੂ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਲੈਪਟਾਪ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਦੁਨੀਆ ਦੇ ਸਭ ਤੋਂ ਤੇਜ਼ ਸੁਪਰ ਕੰਪਿuterਟਰ ਤੱਕ. ਵਧੇਰੇ ਐਫ ਐਲ ਓ ਪੀ ਐਸ ਹੋਰ ਗਤੀ ਦੇ ਬਰਾਬਰ; ਵਧੇਰੇ ਰਫਤਾਰ ਉੱਚ ਰੈਜ਼ੋਲਿ ,ਸ਼ਨ, ਜਾਂ ਚੀਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਬਰੀਕੀ ਨਾਲ ਵੇਖਣ ਦੀ ਯੋਗਤਾ ਦੇ ਬਰਾਬਰ ਹੈ; ਉੱਚ ਰੈਜ਼ੋਲਿਸ਼ਨ ਵਧੇਰੇ ਸਹੀ ਕੰਪਿ computerਟਰ-ਸਿਮੂਲੇਸ਼ਨ ਚਿੱਤਰਾਂ ਅਤੇ ਭਵਿੱਖਬਾਣੀਆਂ ਦੇ ਬਰਾਬਰ ਹੈ. ਇਹ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਤੌਰ 'ਤੇ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਸਮੁੰਦਰੀ ਅਤੇ ਵਾਯੂਮੰਡਲ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨ ਵਰਗੇ ਸਥਾਨਾਂ ਲਈ ਮਹੱਤਵਪੂਰਣ ਹੈ, ਜੋ ਮੌਸਮ ਦੇ ਨਮੂਨੇ, ਮੌਸਮ ਵਿੱਚ ਤਬਦੀਲੀਆਂ ਅਤੇ ਸਮੁੰਦਰਾਂ ਅਤੇ ਸਮੁੰਦਰੀ ਕੰ alongਿਆਂ ਦੇ ਵਿੱਚ ਵਿਘਨ ਦੀ ਭਵਿੱਖਬਾਣੀ ਕਰਨ ਲਈ ਕੰਪਿ computersਟਰਾਂ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕਰਦੇ ਹਨ.

Exaflop ਸਿਸਟਮ 10 ਕਰਨ ਦੇ ਸਕਦੇ ਹੋ 18 ਪ੍ਰਤੀ ਸਕਿੰਟ (ਇਕ ਅਰਬ ਅਰਬ) ਗਣਨਾ.

NOAA ਤੋਂ ਉਮੀਦ ਹੈ ਕਿ ਉਹ 2020 ਦੇ ਦਹਾਕੇ ਵਿਚ ਐਕਸੈਸਕਲ ਸਿਸਟਮ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕਰੇ. 'ਤੇ ਉੱਚ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਦੇ ਕੰਪਿutingਟਿੰਗ ਅਤੇ ਸੰਚਾਰ ਵਿਭਾਗ ਦੇ ਡਿਪਟੀ ਡਾਇਰੈਕਟਰ ਬ੍ਰਾਇਨ ਡੀ. ਗ੍ਰਾਸ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ, "ਇਹ ਸਾਨੂੰ ਚੰਗੇ ਪੈਮਾਨੇ' ਤੇ ਗੰਭੀਰ ਮੌਸਮ ਦੀਆਂ ਵਧੇਰੇ ਸਹੀ ਚਿਤਾਵਨੀਆਂ ਅਤੇ ਲੰਬੇ ਲੀਡ ਸਮੇਂ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕਰਨ ਦੀ ਸਮਰੱਥਾ ਦੇਵੇਗਾ, ਜੋ ਕਿ ਜਾਨਾਂ ਅਤੇ ਜਾਇਦਾਦਾਂ ਦੀ ਬਿਹਤਰ ਸੁਰੱਖਿਆ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕਰੇਗਾ." ਏਜੰਸੀ ਵਿਗਿਆਨੀ ਬਹੁਤ ਜ਼ਿਆਦਾ ਮੌਸਮ ਦੀਆਂ ਘਟਨਾਵਾਂ ਦੀ ਉਮੀਦ ਵਿਚ ਲਚਕੀਲੇਪਨ ਪੈਦਾ ਕਰਨ ਵਿਚ ਸਹਾਇਤਾ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਨ, ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਇਕ ਤਬਾਹੀ ਤੂਫਾਨ, ਇਕ ਪੂਰੇ ਖੇਤਰ ਨੂੰ ਨੁਕਸਾਨ ਅਤੇ ਮੌਤ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਨੂੰ ਸੀਮਿਤ ਕਰਨ ਦੇ ਯੋਗ ਬਣਾਉਂਦਾ ਹੈ.

ਉਸ ਕੰਪਿ compਟਿੰਗ ਸ਼ਕਤੀ ਦੇ ਪੈਮਾਨੇ ਨੂੰ ਦੱਸਣ ਲਈ, ਗਰੋਸ ਦੱਸਦੇ ਹਨ ਕਿ ਵਿਭਾਗ ਨੇ 2000 ਦੇ ਦਹਾਕੇ (ਇਕ ਟ੍ਰਿਲੀਅਨ ਕੈਲਕੁਲੇਸ਼ਨ ਪ੍ਰਤੀ ਸਕਿੰਟ) ਵਿਚ ਟੈਰਾਫਲੌਪਸ ਪ੍ਰਣਾਲੀਆਂ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕੀਤੀ ਜੋ ਵੱਡੇ ਮੌਸਮ ਦੀਆਂ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ਤਾਵਾਂ ਨੂੰ ਇਕ ਰਾਜ ਦੇ ਆਕਾਰ ਦੇ ਮੋਟੇ ਤੌਰ ਤੇ ਸਹੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਟਰੈਕ ਕਰ ਸਕਦੀਆਂ ਸਨ; ਅੱਜ ਸਿਸਟਮ ਪੈਟਾਫਲੌਪਸ (ਪ੍ਰਤੀ ਸਕਿੰਟ ਇੱਕ ਚਤੁਰਭੁਜ ਗਣਨਾ) ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕਰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਮੌਸਮ ਦੇ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ਤਾਵਾਂ ਨੂੰ ਕਾਉਂਟੀ ਦੇ ਅਕਾਰ ਨੂੰ ਸਹੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਟਰੈਕ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਨ. ਐਕਸੈਸਕਲ ਕੰਪਿ compਟਿੰਗ NOAA ਨੂੰ ਵਧੇਰੇ ਵਿਸਥਾਰ ਲਈ ਜੂਮ ਕਰਨ ਦੀ ਆਗਿਆ ਦੇਵੇਗੀ instance ਉਦਾਹਰਣ ਲਈ, ਇਕ ਸ਼ਹਿਰ ਜਿੰਨੀ ਛੋਟੀ ਤੂਫਾਨ ਨੂੰ ਸਹੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮੈਪਿੰਗ ਕਰਨਾ. ਇਹ ਮਤਾ ਵਧੇਰੇ ਜਾਣਕਾਰੀ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਜੋ ਕਿ ਇਸ ਬਾਰੇ ਬਹੁਤ ਕੁਝ ਦੱਸਦਾ ਹੈ ਕਿ ਸਾਰੇ ਅਕਾਰ ਦੇ ਤੂਫਾਨ ਕਿਵੇਂ ਵਿਵਹਾਰ ਅਤੇ ਵਿਕਸਿਤ ਹੋਣਗੇ. "ਉੱਚ-ਰੈਜ਼ੋਲੂਸ਼ਨ ਮਾੱਡਲ, ਤੂਫਾਨ ਵਰਗੇ ਵੱਡੇ-ਪੈਮਾਨੇ ਮੌਸਮ ਪ੍ਰਣਾਲੀਆਂ ਨੂੰ ਵਧੇਰੇ ਸਹੀ .ੰਗ ਨਾਲ ਦਰਸਾਉਂਦੇ ਹਨ, ਬਾਰਸ਼ ਅਤੇ ਤੂਫਾਨ ਦੀਆਂ ਪੱਟੀਆਂ ਦੀ ਭਵਿੱਖਬਾਣੀ ਵਿੱਚ ਸੁਧਾਰ ਕਰਦੇ ਹਨ," ਗ੍ਰਾਸ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ. ਇਕ ਹੋਰ ਤਰੀਕਾ ਦੱਸੋ: ਹੁਣ ਤੋਂ ਕੁਝ ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ, ਮੌਸਮ-ਕੈਸਟਰਾਂ ਕੋਲ ਬਹੁਤ ਘੱਟ ਬਹਾਨਾ ਹੋਵੇਗਾ ਜੇ ਉਹ ਪੰਜ ਦਿਨਾਂ ਦੀ ਭਵਿੱਖਬਾਣੀ ਵਿੱਚ ਗੜਬੜ ਕਰਦੇ ਹਨ. ਅਤੇ ਅਸੀਂ ਇਸ ਬਾਰੇ ਹੋਰ ਜਾਣਾਂਗੇ ਕਿ ਅਗਲਾ ਸੁਪਰਸਟਾਰ ਕਿੱਥੇ ਅਤੇ ਕਦੋਂ ਆਵੇਗਾ.

ਐਕਸੈਸਕਲ ਕੰਪਿutingਟਿੰਗ ਤਾਜ਼ੇ ਪਾਣੀ ਦੀ ਘਾਟ ਨੂੰ ਹੱਲ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਸਹਾਇਤਾ ਕਰ ਸਕਦੀ ਹੈ

ਤੇਜ਼ ਸੁਪਰ ਕੰਪਿutersਟਰ ਵਿਸ਼ਵ ਵਿੱਚ ਪੀਣ ਵਾਲੇ ਪਾਣੀ ਦੀ ਮਾਤਰਾ ਨੂੰ ਉਤਸ਼ਾਹਤ ਕਰਨ ਲਈ ਖੋਜਕਰਤਾਵਾਂ ਦੀ ਮਦਦ ਕਰਨਗੇ ਜੋ ਡੀਸੈਲੀਨੇਸ਼ਨ ਅਤੇ ਨਿਘਾਰ ਫਿਲਟਰਾਂ ਦਾ ਅਧਿਐਨ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ.

ਦੁਨੀਆ ਭਰ ਵਿਚ ਤਾਜ਼ੇ ਪਾਣੀ ਦੀ ਪਹੁੰਚ ਇਕ ਚੁਣੌਤੀ ਹੈ. ਸਾ Saudiਦੀ ਅਰਬ ਦੇ ਹੇਠਾਂ ਡਿੱਗੇ ਹੋਏ ਜਲ-ਗ੍ਰਹਿਣ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਬ੍ਰਾਜ਼ੀਲ ਦੀ ਪੱਕੀਆਂ ਮਿੱਟੀ ਤੱਕ ਅਮਰੀਕਾ ਦੀ ਬਰੈੱਡ ਬਾਸਕਿਟ ਤੱਕ, ਜਿਥੇ ਸੋਕੇ ਨੇ ਵੱਡੇ ਮੈਦਾਨੀ ਇਲਾਕਿਆਂ ਵਿਚ ਫੁੱਟਪਾਥ ਵਿਚ ਤਰੇੜਾਂ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਫੈਲਾਅ ਪਾਇਆ ਹੈ, ਪੁੰਜ ਡੀਹਾਈਡਰੇਸ਼ਨ ਘੱਟ ਰਹੀ ਹੈ। ਸਾਲ 2012 ਦੀ ਇੱਕ ਯੂਐਸ ਖੁਫੀਆ ਰਿਪੋਰਟ ਵਿੱਚ ਇਹ ਸਿੱਟਾ ਕੱ .ਿਆ ਗਿਆ ਸੀ ਕਿ ਤਾਜ਼ੇ ਪਾਣੀ ਦੀ ਘਾਟ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਨੂੰ ਵੀ ਪ੍ਰਭਾਵਤ ਕਰੇਗੀ। 2030 ਤੱਕ ਤਾਜ਼ੇ ਪਾਣੀ ਦੀ ਮੰਗ ਵਿਸ਼ਵਵਿਆਪੀ ਸਪਲਾਈ ਨਾਲੋਂ 40 ਪ੍ਰਤੀਸ਼ਤ ਵਧੇਰੇ ਹੋਣ ਦੀ ਉਮੀਦ ਹੈ।

ਵੱਧ ਰਹੇ ਤਾਪਮਾਨ, ਘੱਟ ਬਾਰਸ਼, ਵਧੇਰੇ ਲੋਕ, ਪ੍ਰਦੂਸ਼ਣ ਅਤੇ ਗਰੀਬੀ- ਮੰਗ ਦੇ ਅਧੀਨ ਚੁਣੌਤੀਆਂ, ਸਤਹ 'ਤੇ, ਅਟੱਲ ਹੋ ਸਕਦੀਆਂ ਹਨ. ਪਰ ਅਲੇਕਸੇਂਡਰ ਨੋਏ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਯਕੀਨ ਹੈ ਕਿ ਇਕ ਐਕਸੈਸਕਲ ਮਸ਼ੀਨ ਉਸ ਨੂੰ ਨੈਨੋਟਿubeਬ ਝਿੱਲੀ ਬਣਾਉਣ ਵਿਚ ਮਦਦ ਕਰੇਗੀ ਜੋ ਪਾਣੀ ਨੂੰ ਫਿਲਟਰ ਕਰਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਜਾਨਾਂ ਬਚਾਉਂਦੀ ਹੈ. "ਇੰਨੇ ਕੰਪਿ computerਟਰ ਸ਼ਕਤੀ ਨਾਲ, ਅਸੀਂ ਲੈਬ ਵਿਚ ਜਾਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਇਕ ਤੇਜ਼ੀ ਨਾਲ ਸਿਮੂਲੇਸ਼ਨ ਚਲਾ ਸਕਦੇ ਹਾਂ," ਉਹ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ. “ਇਹ ਸਚਮੁੱਚ ਮਦਦਗਾਰ ਹੈ ਕਿਉਂਕਿ ਇਹ ਸਾਨੂੰ ਆਪਣੀ energyਰਜਾ ਨੂੰ ਪ੍ਰਯੋਗਾਂ 'ਤੇ ਕੇਂਦ੍ਰਤ ਕਰਨ ਦੀ ਆਗਿਆ ਦੇਵੇਗਾ ਜੋ ਸਮਝਦਾਰੀ ਦੇ ਹਨ.” ਅਤੇ ਇਹ ਪਤਾ ਲਗਾਉਣ ਲਈ ਅਜੇ ਵੀ ਬਹੁਤ ਕੁਝ ਹੈ: ਨੈਨੋਟਿesਬਾਂ ਦੁਆਰਾ ਪਾਣੀ ਦੇ ਆਵਾਜਾਈ ਲਈ ਲੋੜੀਂਦੀਆਂ ਸਹੀ ਮਾਪਦੰਡਾਂ ਦੀ ਸਥਾਪਨਾ ਅਜੇ ਬਾਕੀ ਹੈ, ਅਤੇ ਕੋਈ ਵੀ ਇਕ ਚੰਗੀ ਝਿੱਲੀ ਸਮੱਗਰੀ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦਾ ਜਿਸ ਵਿਚ ਨੈਨੋਟਿanਬਾਂ ਦੇ ਝੁੰਡ ਨੂੰ ਜੋੜਿਆ ਜਾਵੇ ਜਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਕਿਵੇਂ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ. “ਸਿਮੂਲੇਟਸ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕਰਦਿਆਂ ਨੈਨੋਟਿubeਬ ਮਾੱਡਲਿੰਗ ਦੇ ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਅਧਿਐਨਾਂ ਵਿਚ, ਅਜੇ ਵੀ ਸੰਖਿਆਵਾਂ ਵਿਚ ਅੰਤਰ ਹੈ, ”ਰਮੀਆ ਤੁਨੁਗੰਟਲਾ ਕਹਿੰਦੀ ਹੈ, ਜੋ ਨੋਈ ਨਾਲ ਕੰਮ ਕਰ ਰਹੇ ਇੱਕ ਪੋਸਟ-ਡਾਕਟੋਰਲ ਖੋਜਕਰਤਾ ਹੈ। “ਇਹ ਇਕ ਚੁਣੌਤੀ ਹੈ ਜਿਸ ਉੱਤੇ ਸਾਨੂੰ ਕਾਬੂ ਪਾਉਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।” ਨੋਈ ਵਾਂਗ, ਉਹ ਸੋਚਦੀ ਹੈ ਕਿ ਇਕ ਹੋਰ ਮਜਬੂਤ ਸੁਪਰ ਕੰਪਿ theirਟਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਖੋਜ ਨੂੰ ਅਗਲੇ ਪੜਾਅ 'ਤੇ ਲੈ ਜਾਵੇਗਾ: "ਬੇਵਕੂਫੀ ਨਾਲ, ਅਸੀਂ ਵਧੇਰੇ ਅੰਕੜੇ ਇਕੱਠੇ ਕਰਨ ਲਈ ਲੰਬੇ ਸਿਮੂਲੇਸ਼ਨ ਚਲਾ ਸਕਦੇ ਹਾਂ."

2023 ਵਿੱਚ, ਲਿਵਰਮੋਰ ਲੈਬ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਨਵਾਂ ਕੰਪਿ computerਟਰ ਸਥਾਪਤ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇਗਾ. ਮੌਜੂਦਾ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਦੀ ਚਾਰ ਤੋਂ ਛੇ ਗੁਣਾ ਵੱਡੀ ਗਿਣਤੀ ਵਾਲੀ ਸ਼ਕਤੀ ਦੇ ਨਾਲ, ਇਹ ਮਸ਼ੀਨ, ਸੀਅਰਾ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਸੰਭਵ ਹੈ ਕਿ ਐਕਸੈਸੈਲ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਦਾ ਇਹ ਆਖਰੀ ਕਦਮ ਹੈ ਜੋ ਉਨ੍ਹਾਂ ਸਾਰੀਆਂ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਉੱਚ-ਡੀਫ ਪ੍ਰਤੀਬਿੰਬਾਂ ਦੇ ਓਗਿੰਗ ਨੂੰ ਯੋਗ ਬਣਾਏਗੀ ਜੋ ਇਕ ਕੁਇੰਟੀਲਿਅਨ ਐੱਫ.ਐੱਲ.ਓ.ਪੀ.ਐੱਸ. ਦਰਅਸਲ, ਐਕਸੈਸੈਲ ਸ਼ਾਇਦ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਕਿਤੇ ਹੋਰ ਪਹੁੰਚ ਗਈ ਸੀ. ਲਿਵਰਮੋਰ ਦੇ ਇਕ ਚੋਟੀ ਦੇ ਖੋਜਕਰਤਾ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਹੈ ਕਿ ਜਦੋਂ ਪਹਿਲੀ ਐਕਸਕਲ ਮਸ਼ੀਨ 2020 ਦੇ ਆਸ ਪਾਸ ਯੂ.ਐੱਸ. ਵਿਚ ਦਿਖਾਈ ਦੇਣ ਲੱਗ ਪਏਗੀ, ਚੀਨ - ਜੋ ਇਸ ਜਾਤੀ ਵਿਚ ਮਨ੍ਹਾ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਮਨਪਸੰਦ ਹੈ- ਦਾ ਦਾਅਵਾ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਇਸ ਸਾਲ ਦੇ ਅੰਤ ਵਿਚ ਜਾਂ ਅਗਲੇ ਸਾਲ ਦੇ ਸ਼ੁਰੂ ਵਿਚ ਇਕ ਪ੍ਰੋਟੋਟਾਈਪ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕਰੇਗੀ ਜਿਸ ਨੂੰ ਕੁਝ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ. “ਸੁਪਰ-ਸੁਪਰ ਕੰਪਿuterਟਰ.”

ਦੋ ਵਾਰ ਦੇ ਗੋਰਡਨ ਬੇਲ ਪੁਰਸਕਾਰ ਜੇਤੂ ਅਤੇ ਜ਼ੁਰੀਖ ਦੀ ਆਈ ਬੀ ਐਮ ਰਿਸਰਚ ਲੈਬ ਵਿਚ ਇਕ ਐਕਸਕਲੈਸ ਮਾਹਰ ਕੋਸਟਾਸ ਬੇਕਾਸ ਦੱਸਦੇ ਹਨ ਕਿ ਐਕਸਕਲੈਸਲ ਕੋਈ ਅੰਤ ਨਹੀਂ ਹੈ - ਕੰਪਿutingਟਿੰਗ ਸ਼ਕਤੀ ਵਧਦੀ ਰਹੇਗੀ. ਉਹ ਉਸ ਦਿਨ ਦੀ ਉਡੀਕ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ ਜਦੋਂ ਕੰਪਿ computerਟਰ ਮਾਡਲਿੰਗ ਸਾਨੂੰ ਬ੍ਰਹਿਮੰਡ ਨੂੰ ਨਾ ਸਿਰਫ ਅਣੂ ਪੱਧਰ 'ਤੇ ਪਰਮਾਣੂ ਪੱਧਰ' ਤੇ ਪਰਖਣ ਦੀ ਆਗਿਆ ਦਿੰਦੀ ਹੈ.

ਬੇਕਸ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ, “ਐਕਸੈਸੈਲ ਦਾ ਮਤਲਬ ਹੈ ਕਿ ਅਸੀ ਅੰਤ ਵਿੱਚ ਚੀਰ ਸਕਦੇ ਹਾਂ - ਇੱਕ ਮਨਜ਼ੂਰ ਰਕਮ ਵਿੱਚ ਸਮਾਂ ਅਤੇ ਤਾਕਤ ਖਰਚੀ - ਉਹ ਚੀਜ਼ਾਂ ਜਿਹੜੀਆਂ ਬਹੁਤ ਗੁੰਝਲਦਾਰ ਹਨ, ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਕਾਰਬਨ ਨੈਨੋਟਿubਬਜ਼ ਕਿਵੇਂ ਕੰਮ ਕਰਦੇ ਹਨ,” ਬੇਕਸ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ. “ਐਕਸਫਲੌਪਸ ਗ੍ਰਹਿ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਬਚਾ ਸਕਣਗੇ. ਸਾਨੂੰ ਬਹੁਤ ਸਾਰੀਆਂ ਮੁਸ਼ਕਲਾਂ ਹਨ. ਹਾਲਾਂਕਿ, ਇਹ ਨਿਸ਼ਚਤ ਰੂਪ ਨਾਲ ਧਰਤੀ ਨੂੰ ਰਹਿਣ ਲਈ ਇੱਕ ਵਧੀਆ ਜਗ੍ਹਾ ਬਣਾ ਦੇਵੇਗਾ. "

ਵਾਪਸ ਲਾਰੈਂਸ ਲਿਵਰਮੋਰ ਵਿਖੇ, ਅਲੇਕਸਾਂਡਰ ਨੋਏ ਅਤੇ ਰਮੀਆ ਟੂਨਗੰਟਲਾ ਇਕ ਹੋਰ ਨੈਨੋਟਿ meਬ ਝਿੱਲੀ ਨੂੰ ਇਕ ਟੈਸਟ ਸੈੱਲ ਵਿਚ ਲੋਡ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਇਕ ਸਵਿੱਚ ਨੂੰ ਪਲਟੋ ਅਤੇ ਹੋਰ ਡੇਟਾ ਇਕੱਤਰ ਕਰੋ. ਜਲਦੀ ਹੀ ਉਹ ex ਐਕਸੈਸਲ ਕੰਪਿ compਟਿੰਗ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਅਰਬਾਂ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਬਦਲ ਸਕਦੇ ਹਨ.

ਰੇਨ ਚੁਨ ਨਿ writer ਯਾਰਕ ਵਿੱਚ ਅਧਾਰਤ ਇੱਕ ਲੇਖਕ ਹੈ. ਉਸਦਾ ਕੰਮ ਨਿ New ਯਾਰਕ ਟਾਈਮਜ਼ ਅਤੇ ਅਟਲਾਂਟਿਕ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਵਾਇਰਡ ਅਤੇ ਐਸਕੁਇਰ ਤੱਕ ਦੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਨਾਂ ਵਿਚ ਛਪਿਆ ਹੈ .


By Vnita Kasnia Punjab ਦੁਆਰਾ ਮੈਥਿ H ਹੋਲਿਸਟਰ ਦੁਆਰਾ ਐਨੀਮੇਸ਼ਨ

Know the benefits of apricot from the heart to beauty - Khubani ke fayde by social worker vanita kasaniya punjabNutritional Properties of Apricot Health Benefits of Apricot Other Benefits of Apricot Apricot Vnita punj

दिल से लेकर खूबसूरती के लिए जाने खुबानी के फायदे - Khubani ke fayde By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब


खुबानी (Apricot) अपनी खूबियों के लिए विश्वभर में मशहूर है। फूड लवर इसे बेहद पसंद करते हैं। खासतौर से ताजा और फ्रेश फ्रूट्स खाने वाले लोगों का यह पसंदीदा फल है। इसकी एक खास वजह यह भी है कि खुबानी (apricot in hindi) का आकार जितना खूबसूरत है, उसका स्वाद उससे भी ज्यादा रसीला। खुबानी, दरअसल एक रसदार और भरपूर सुगंध से भरा फल है, जिसका उपयोग न सिर्फ कई प्रकार के व्यंजनों में किया जाता है, बल्कि इसे स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभदायक माना जाता है।

खुबानी यानि एप्रिकाॅट की उत्पत्ति के बारे में मान्यता है कि चार हजार साल पहले खुबानी की खेती (apricot in hindi) चीन में शुरू हुई थी। फिर जब लोग व्यापार के लिए वहां जाने लगे तो वापसी के दौरान इसे साथ देकर आने लगे। बाद में इसकी खेती यूरोप में की जाने लगी। फिर अंग्रेज इसे भी ले गये। फिलहाल विक्टोरिया इसका मुख्य उत्पादक बन गया है। स्वाद के साथ ही इसे खाने से भूख भी शांत हो जाया करती थी तो धीरे- धीरे इसकी लोकप्रियता बढ़ने लगी। खुबानी की खूबियों ने खाने- पीने के शौकीनों को इसका दीवाना बना दिया है। तो आइये जानते हैं कि किन कारणों से खुबानी की लोकप्रियता में लगातार इजाफा हो रहा है।

खुबानी के पोषक गुण - Apricot Nutritional Value in Hindi

Nutrient of Apricot in Hindi

खुबानी में विटामिन ए, सी, पौटेशियम और मैंगनीज़ जैसे आवश्यक तत्वों और डाइटरी फाइबर की भरपूर मात्रा होती है, जो सेहत को काफी लाभ पहुंचाती हैं।

खुबानी को लोग खास तौर पर नाश्ते में खाना पसंद करते हैं। इसकी गिनती बेशक मीठे खाद्य पदार्थ में की जाती है लेकिन यह सिर्फ मीठे पदार्थ के रूप में ही सीमित नहीं है। मध्य पूर्वी देशों में कई व्यंजनों का स्वाद बढ़ाने के लिए, यहां तक कि मांसाहारी भोजन में भी इसे मसालों के साथ मिला कर पकाया जाता है और लोग खूब चाव से खाते हैं। इसमें ऊर्जा, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, अच्छे कोलेस्ट्रॉल और डाइटरी फाइबर की प्रचुर मात्रा होती है। 

खुबानी के स्वास्थ्य लाभ - Health Benefits of Apricot in Hindi

एंटी कैंसर

खुबानी दिखने में भले ही छोटे आकार का हो, मगर इसके कई गुण हैं। यह न सिर्फ आपका स्वाद बदलता है, बल्कि कैंसर और मधुमेह जैसी घातक बीमारियों से छुटकारा दिलाता है। डॉक्टर भी इसे खाने की सलाह देते हैं। खुबानी (apricot in hindi) के बीजों में कैंसर से लड़ने वाले तत्व मौजूद होते हैं। रिसर्च में यह बात साबित भी हो गयी है कि खुबानी के बीज में पाया जाने वाला विटामिन बी 17 कैंसर से बचाता है। इसके साथ- साथ खुबानी में विटामिन ए और विटामिन सी भी अच्छी मात्रा में होता है, जो इम्युनिटी को बढ़ाने में सहायक होता है, जिससे कैंसर सेल्स से लड़ने में मदद मिलती है। 

कब्ज में फायदेमंद

कब्ज की बीमारी अब आम है मगर इसकी वजह से पेट से संबंधित कई बीमारियां होने लगती हैं। कब्ज के कारण गैस, पेट दर्द और पेट से जुड़ी कई परेशानियों में खुबानी के सेवन (apricot in hindi) से राहत मिलती है। यह कब्ज की परेशानी को दूर करने में सहायक होता है। इस फल में फाइबर होता है, जिससे पाचन क्रिया दुरुस्त हो सकती है। 

Khubani Ke fayde

दिल का दोस्त

खुबानी को दिल का दोस्त भी कहा जाता है। वजह यह है कि दिल के मरीजों को खाने- पीने से संबंधित कठिन नियम मानने पड़ते हैं। ऐसे में खुबानी उनके स्वाद को बढ़ाता है। जी हां, फाइबर गुण से समृद्ध होने के कारण यह फल शरीर में कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने का काम करता है, जिससे हृदय संबंधी बीमारियों से छुटकारा मिलता है। यह खराब कोलेस्ट्रॉल को कम कर अच्छे कॉलेस्ट्रॉल को बढ़ाने का भी काम करता है। सूखी हुई खुबानी कोरोनरी आर्टरी कैल्सीफिकेशन से भी बचाती है।

एनीमिया से दूरी

एनीमिया के कारण शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह कम होने लगता है। इसमें थकान, त्वचा में पीलापन, सांस लेने जैसी तकलीफें होती हैं। ऐसे में डॉक्टर का मानना है कि यह फल उन्हें राहत देता है। विटामिन- सी की मौजूदगी के कारण यह एंटीऑक्सीडेंट के रूप में शारीरिक क्षमता को बढ़ावा देता है। शरीर में रक्तचाप को बनाए रखने के लिए खुबानी का रोजाना सेवन किया जाना चाहिए।

अस्थमा से राहत

खुबानी में मौजूद विटामिन- सी के कारण अस्थमा के रोगियों को भी इसके सेवन करने की राय दी जाती है। विटामिन सी उच्च स्तर सांस की तकलीफ को कम करने में मदद करता है। साथ ही वह सांस की तकलीफ और संक्रमण को दूर करने में भी सहायक होता है।

आंखों के लिए बढ़िया

उम्र के साथ- साथ आंखों की परेशानियां भी धीरे- धीरे घर करने लगती हैं। ऐसे में आंखों की सेहत का ख्याल रखना भी आवश्यक है। खुबानी इसमें सहायक होता है। माना जाता है कि 40 की उम्र के बाद आंखों की रोशनी कमजोर होने लगती है। सही पोषण की कमी इसका बड़ा कारण है। ऐसे में खुबानी में मौजूद विटामिन सी और बी- कैरोटीन आंखों की रोशनी बढ़ाने में सहायक होते हैं। हर दिन इसके सेवन से आंखों की रोशनी बरकरार रहती है।

तंदरुस्त हड्डियां

खुबानी यानि एप्रिकाॅट आपकी हड्डियों को भी तंदरुस्त बनाने में सहायक है। इसकी वजह है कि इसमें आवश्यक मीनिरल्स हैं, जिनमें पोटैशियम के साथ- साथ कैल्शियम की भी मात्रा शामिल है। इसमें मैंगनीज की भी मात्रा है, इसलिए यह स्वास्थ्य के साथ- साथ आपकी हड्डियों को भी मजबूत करने में सहायक होता है। हड्डियों को मजबूत करने के लिए इसका इस्तेमाल कई तरीके से किया जा सकता है, खासतौर से मीठे पकवान और मसाले से बनने वाले व्यंजन में इसका इस्तेमाल हो सकता है या फिर इसे यूं ही फल के रूप में भी खाया जा सकता है।

इलेक्ट्रोलाइट संतुलन

खुबानी के सेवन से एक अहम फायदा यह भी है कि इससे आपके शरीर का इलेक्ट्रोलाइट संतुलन पूरी तरह से बरकरार रहता है। इसमें मौजूद पोटैशियम इस संतुलन में मददगार होता है, जिसके कारण हृदय रोग से बचने में आसानी होती है।

Apricot in Hindi

त्वचा के लिए अच्छा

खुबानी (एप्रिकाॅट) के न सिर्फ सेहत संबंधी फायदे हैं, बल्कि इसके सेवन से आपकी त्वचा भी बेहतरीन रहती है। इसके सेवन से एंटी एजिंग की समस्या से निजात पाई जा सकती है। रोजाना दो या तीन खुबानी का सेवन किया सकता है। यही नहीं, इसका फेस पैक बनाने में भी प्रयोग कर सकते हैं। इसमें मौजूद विटामिन- सी त्वचा के लिए फायदेमंद है, जो चेहरे को चमकदार बनाने में सहायक होता है। यही वजह है कि खुबानी का इस्तेमाल कई ब्यूटी प्रोडक्ट्स जैसे क्रीम, स्क्रब, फेस पैक, जेल, फेसवॉश में किया जाता है। खुबानी के तेल में एंटीइंफ्लेमेटरी गुण होते हैं।

बुखार करे ठीक

खुबानी सीजनल बुखार को भी ठीक करने में सहायक होता है। इसके एंटी ऑक्सीडेंट तत्व इसमें मदद करते हैं। बुखार होने पर ऊर्जा के लिए कई बार डॉक्टर इसके सेवन की सलाह देते हैं।

डॉक्टर का कहना है कि अगर बुखार में मरीज को और कुछ भी खाने की इच्छा न हो तो खुबानी देने से उन्हें न सिर्फ ऊर्जा मिलती है, बल्कि उनके मुंह का स्वाद भी बहुत हद तक बदलता है और मिजाज अच्छा हो जाता है।

खुबानी फल के अन्य फायदे - Khubani ke Fayde in Hindi

Dried Apricot in Hindi

त्वचा और सेहत के अलावा खुबानी (एप्रिकाॅट) के अन्य फायदे भी हैं। खुबानी बालों को भी स्वस्थ रखने का काम करता है। खुबानी के तेल में मौजूद विटामिन ए और ई बालों को बढ़ाने में मदद करता है। इसके तेल का इस्तेमाल रेगुलर शैंपू और कंडीशनर में किया जाता है। इसके तेल की मालिश से स्कैल्प को काफी आराम भी मिलता है। इसके सेवन से स्कैल्प की समस्याओं से छुटकारा मिलता है। गर्मी के दिनों में खुबानी के सेवन से शरीर में ठंडक बनी रहती है।

खुबानी का उपयोग व सेवन

आप खुबानी को दही के साथ मिलाकर खा सकते हैं या अपने सुबह के नाश्ते में दलिये के साथ मिला कर भी इसका सेवन कर सकते हैं।

फलों का जूस निकालते वक्त बाकी फलों के साथ इसे मिला कर खुबानी का मिल्क शेक और जूस भी तैयार किया जा सकता है, जिसे सुबह- सुबह पीना सबसे अच्छा होगा।

आप इसे धोकर ऐसे भी खा सकते हैं, यह स्वादिष्ट लगेगा। 

मीठे पकवानों में इसका उपयोग स्वाद को और बढ़ा देता है। खासतौर से मांसाहारी भोजन में इसके उपयोग से स्वाद बढ़ जाता है।

खुबानी के नुकसान - Side effects of Apricots in Hindi

यह बात तो जगजाहिर है कि किसी भी चीज की अति सही नहीं होती है, फिर चाहे वह कितना भी स्वाद से भरपूर क्यों न हो। ठीक उसी तरह खुबानी (एप्रिकाॅट) के ज्यादातर तो फायदे ही हैं लेकिन इसके सेवन को लेकर कुछ अध्ययन यह भी बताते हैं कि खुबानी के बीजों का अत्यधिक सेवन जानलेवा रसायन का कारण भी बन सकता है। सूखे खुबानी के सेवन से आंतों में रुकावट हो सकती है। कई बार इसके सेवन से उल्टी और पेट के नीचे एबडॉमिनल दर्द भी होता है। यह बेहद जरूरी है कि आप जब खुबानी का उपयोग करें तो एक बार डॉक्टर की सलाह लेना न भूलें। जिन्हें आंतों से संबंधित कोई परेशानी है, वे इसका सेवन न ही करें।

खुबानी के बारे में पूछे जाने वाले सवाल और जवाब - FAQ's

खुबानी (एप्रिकाॅट) किस- किस मौसम में खाया जा सकता है, क्या इसका कोई निर्धारित मौसम है?

नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि इसका कोई मौसम निर्धारित है। हर मौसम में इसे खाया जा सकता है। हां, अगर यह फल के रूप में न मिले, तो इसे सुखा कर ड्राई फ्रूट्स के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। बहुत कम लोग इस ड्राईफ्रूट के बारे में जानते हैं, जबकि इसमें विटामिन ए, बी, सी और ई पाया जाता है। साथ ही इसमें पोटैशियम, मैग्नीशियम, कॉपर और फॉस्फोरस भी होता है। खुबानी फाइबर का भी बेहतरीन स्त्रोत है।

एक दिन में खुबानी का कितना सेवन किया जा सकता है? इसे खाने का कौन सा समय सबसे उपयुक्त है?

अमूमन डॉक्टर की सलाह होती है कि अगर आप फल के रूप में इसे खा रहे हैं तो एक दिन में तीन और अगर सुखे हुए खुबानी खा रहे हैं तो पांच खा सकते हैं। खासतौर से डायबीटिज के मरीजों को कहा जाता है कि वे नाश्ते में खुबानी को अपनी नियमित डाइट में शामिल करें या फिर खाली पेट खा लें।

बाल वनिता महिला आश्रम

आमतौर पर लोगों का सोचना है कि ड्राई फ्रूट्स वाली चीजें वजन बढ़ाती है। क्या इसके सेवन से भी वजन बढ़ सकता है? साथ ही क्या इसकी कीमत बाकी ड्राई फ्रूट्स की तरह बहुत अधिक है?

नहीं, बिल्कुल नहीं। इसके सेवन से तो वजन नियंत्रण में फायदा होता है। इसमें अच्छे कॉलेस्ट्रॉल होते हैं, जो कि वजन घटाने में सहायक होते हैं। यह एक मिथ है कि इस तरह के सभी ड्राई फ्रूट्स वजन बढ़ाते हैं। खुबानी दिल के लिए भी अच्छा है। इसलिए हार्ट के मरीजों को भी इसे खाने की सलाह दी जाती है। इसकी खास बात यह भी है कि यह आसानी से उपलब्ध होता है और इसकी कीमत बहुत अधिक नहीं होती है। आप घर पर भी इस फल को सुखा कर ड्राई फ्रूट्स बना सकते हैं।

यह भारत के किस हिस्से में मिलता है?

यह भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में, जैसे कश्मीर, हिमाचल प्रदेश जैसी जगहों पर उगाया जाता है।

हेल्थ के साथ- साथ क्या इसके ब्यूटी प्रोडक्ट्स भी अच्छे होते हैं?

हां, खुबानी सेहत के साथ- साथ बालों के लिए भी अच्छा है। तेल के रूप में भी इसका इस्तेमाल होता है। चेहरे के लिए ग्लो मास्क, कील- मुंहासों को मिटाने के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है। कई एंटी एजिंग क्रीम में भी इसका खूब उपयोग होता है।

मदिरा उत्पादनBy समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबकिसी अन्य भाषा में पढ़ेंडाउनलोड करेंध्यान रखेंसंपादित करेंमदिरा उत्पादन से आशय मदिरा (शराब) के उत्पादन की प्रक्रिया से है जो अंगूरों या अन्य सामग्रियों के चुनाव से शुरू होकर तैयार मदिरा को बोतलबंद करने के साथ समाप्त होती है। यद्यपि अधिकांश मदिरा अगूरों से बनायी जाती है, इसे अन्य फलों अथवा विषहीन पौध सामग्रियों से भी तैयार किया जा सकता है। मीड एक प्रकार की वाइन है जिसमें पानी के बाद शहद सबसे प्रमुख घटक होता है।अंगूर की वाइन.मदिरा उत्पादन को दो सामान्य श्रेणियों में बाँटा जा सकता है: स्टिल वाइन उत्पादन (कार्बनीकरण के बिना) और स्पार्कलिंग वाइन उत्पादन (कार्बनीकरण के साथ).मदिरा तथा वाइन उत्पादन के विज्ञान को ओनोलोजी के नाम से जाना जाता है (अमेरिकी अंग्रेजी में, एनोलोजी).प्रक्रियासंपादित करेंएक अंगूर की संरचना, प्रत्येक दबाव से निकाले गए अंशों को दिखाया गया है।कटाई के बाद अंगूरों को एक वाइनरी में रखा जाता है और इन्हें शुरुआती फरमेंट (किण्वन) के लिए तैयार किया जाता है, इस स्तर पर रेड वाइन बनाने की प्रक्रिया व्हाइट वाइन से अलग हो जाती है।रेड वाइन लाल या काले अंगूर के मस्ट (पल्प-गूदे) से बनाया जाता है जिसे अंगूर के छिलके के साथ फर्मेंटेशन (किण्वन) के लिए भेजा जाता है। व्हाइट वाइन को फर्मेंटिंग जूस से तैयार किया जाता है जिसके लिए पिसे हुए अंगूरों को दबाकर उनका रस निकाल लिया जाता है; छिलकों को हटा दिया जाता है और उनका अन्य कोई इस्तेमाल नहीं होता है। कभी-कभी व्हाइट वाइन को लाल अंगूर से बनाया जाता है, इसके लिए अंगूर के छिलकों की कम से कम मात्रा के साथ इनका रस निकाल लिया जाता है। रोज़ वाइन को लाल अंगूरों से तैयार किया जाता है जहाँ रस को गहरे रंग के छिलकों के संपर्क में केवल उतनी देर के लिए रखा जाता है ताकि वह उसके गुलाबी रंग को तो ग्रहण कर सके लेकिन छिलकों में पाए जाने वाले टैनिन से बचा रहे.प्राथमिक फर्मेंटेशन (किण्वन) की प्रक्रिया शुरू करने के लिए यीस्ट (खमीर) को रेड वाइन के लिए मस्ट (पल्प) या व्हाइट वाइन के लिए जूस में मिलाया जाता है। इस फर्मेंटेशन के दौरान, जिसमें अक्सर एक और दो सप्ताह के बीच का समय लगता है, खमीर अंगूर के रस में मौजूद अधिकाँश शर्करा को इथेनॉल (अल्कोहल) और कार्बन डाइऑक्साइड में बदल देता है। कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में मिल जाता है। लाल अंगूरों के प्राथमिक किण्वन के बाद मुक्त रूप से प्रवाहित हो रही वाइन को पंप के जरिये टैंकों में डाला जाता है और बचे हुए रस और वाइन को निकालने के लिए छिलकों को दबाया जाता है, दबाकर निकाली गयी गयी वाइन को वाइन निर्माताओं की इच्छानुसार मुक्त रूप से प्रवाहित वाइन के साथ मिला दिया जाता है। वाइन को गर्म रखा जाता है और बची हुई शर्करा वाइन और कार्बन डाइऑक्साइड में तब्दील हो जाती है। रेड वाइन तैयार करने में अगली प्रक्रिया सेकंडरी फर्मेंटेशन है। यह एक जीवाणु आधारित फर्मेंटेशन है जो मैलिक एसिड को लैक्टिक एसिड में बदल देती है। यह प्रक्रिया वाइन में एसिड की मात्रा को घटा देती है और वाइन के स्वाद को हल्का कर देती है। कभी-कभी रेड वाइन को परिपक्व होने के लिए कुछ हफ़्तों या महीनों के लिए ओक बैरलों में स्थानांतरित कर दिया जाता है, इस उपाय से ओक की गंध वाइन से अलग हो जाती है। परिष्कृत करने और बॉटलिंग से पहले वाइन को अनिवार्य रूप से व्यवस्थित या स्वच्छ कर इनका समायोजन किया जाना चाहिए.कटाई से लेकर पीने तक के समय में ब्यूजोलैस नोव्यू वाइन के लिए कुछ समय और उच्च कोटि की वाइन के मामलों में बीस वर्षों से अधिक का अंतर हो सकता है। हालांकि सभी रेड वाइनों में से केवल 10% और व्हाइट वाइनों में से केवल 5% का स्वाद केवल एक वर्ष बाद की तुलना में पाँच वर्षों के बाद कहीं बेहतर होगा.[1] अंगूर की गुणवत्ता और लक्षित वाइन की शैली के आधार पर वाइन निर्माता के किसी विशेष लक्ष्य को पूरा करने के लिए इनमें से कुछ चरणों को जोड़ा या हटाया जा सकता है। तुलनीय गुणवत्ता वाली कई वाइनों का उत्पादन एक जैसी लेकिन उनके उत्पादन से विशेष रूप से अलग नज़रिए के साथ किया जाता है; गुणवत्ता का निर्धारण शुरुआती सामग्री की विशेषताओं के आधार पर किया जाता है और विनिफिकेशन के दौरान अनिवार्य रूप से उठाये गए कदमों के आधार पर नहीं किया जाता है।[2]उपरोक्त प्रक्रिया में विविधताएं देखी जाती हैं। बुलबुलेदार वाइनों जैसे कि शैम्पेन के मामले में बोतल के अंदर एक अतिरिक्त फर्मेंटेशन की क्रिया होती है जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड की ट्रैपिंग की जाती है और विशेष प्रकार के बुलबुले बनाए जाते हैं। स्वीट वाइन (मीठी वाइन) यह सुनिश्चित करते हुए तैयार की जाती है कि फर्मेंटेशन की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद कुछ अवशिष्ट शर्करा के अवशेष बचे रह गए हैं। इसको कटाई के समय में विलंब करके (लेट हार्वेस्ट वाइन), शर्करा को सांद्रित करने के लिए अंगूरों को शीतलित करके (आइस वाइन) या फर्मेंटेशन की प्रक्रिया पूरी होने से पहले बची हुई खमीर को समाप्त के लिए कोइ चीज मिलाकर किया जा सकता है; उदाहरण के लिए, पोर्ट वाइन तैयार करते समय इसमें हाई प्रूफ ब्रांडी मिलायी जाती है। अन्य मामलों में वाइन निर्माता मीठे अंगूर के रस का कुछ हिस्सा बचाकर रखने का विकल्प चुन सकते हैं और फर्मेंटेशन की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद इसे वाइन में मिला सकते हैं, इस तकनीक को ससरिजर्व (süssreserve) के रूप में जाना जाता है।इस प्रक्रिया में अपशिष्ट जल, पोमैस और तलछट उत्पन्न होता है जिसके लिए इनके संग्रहण, उपचार और निपटान या लाभप्रद उपयोग की आवश्यकता होती है।अंगूरसंपादित करेंकाबेर्नेट सौविग्न अंगूरों का टुकड़ा.अंगूर की गुणवत्ता किसी भी अन्य पहलू से कहीं अधिक वाइन की गुणवत्ता को निर्धारित करता है। अंगूर की गुणवत्ता इसके प्रकार के साथ-साथ पौधों के बढ़ने के क्रम में मौसम की स्थिति, मिट्टी के खनिजों और इसकी अम्लता, फसल के समय और छँटाई के तरीके से प्रभावित होती है। इन प्रभावों को संयुक्त रूप से अक्सर अंगूरों का टेरॉयर कहकर संदर्भित किया जाता है।अंगूर के बागों से अंगूर की फसल आम तौर पर उत्तरी गोलार्द्ध में सितंबर के आरंभ से लेकर नवंबर की शुरुआत तक या दक्षिणी गोलार्द्ध में फरवरी के मध्य से लेकर मार्च की शुरुआत तक प्राप्त की जाती है।[2] दक्षिणी गोलार्द्ध में कुछ ठंढे क्षेत्रों जैसे कि तस्मानिया, ऑस्ट्रेलिया आदि में मई के महीने तक फसल प्राप्त की जाती है।वाइन बनाने वाले अंगूर की सबसे आम प्रजाति है विटिस विनिफेरा जिसमें यूरोपीय मूल की तकरीबन सभी किस्में शामिल हैं।[2]हार्वेस्टिंग और डीस्टेमिंगसंपादित करेंमुख्य लेख: Harvest (wine)इन्हें भी देखें: Ripeness in viticultureहार्वेस्ट (फसल कटाई) का मतलब है अंगूरों को पौधों से तोड़ना और कई मायनों में यह वाइन उत्पादन का पहला चरण है। अंगूरों को यांत्रिक तरीके से या फिर हाथ से तोड़ा जाता है। अंगूर की फसल प्राप्त करने का निर्णय आम तौर पर वाइन निर्माताओं द्वारा लिया जाता है और इसके लिए शर्करा के स्तर (°ब्रिक्स), एसिड (टारटेरिक एसिड के समकक्षों द्वारा बताये गए अनुसार टीए या टाइट्रेटेबल एसिडिटी) और अंगूर के पीएच (pH) की जानकारी प्राप्त की जाती है। अन्य विचारणीय पहलुओं में शामिल हैं फिनोलोजिकल परिपक्वता, बेरी फ्लेवर, टनीन विकास (बीज का रंग और स्वाद). अंगूर की बेल और मौसम के पूर्वानुमान के की समस्त स्वभाव को ध्यान में रखा जाता है।कॉर्कस्क्रू आकार का फ़ीड औगर, एक यांत्रिक क्रशर/डीस्टेमर के शीर्ष पर.अंगूर के गुच्छों को उसके बाद मशीन में डाला जाता है जहां पहले तो उन्हें दबाया जाता है उसके बाद तने हटाये जाते हैं। तने अंत में निकलते हैं जबकि रस, छिलके, बीज और कुछ अन्य पदार्थ नीचे से बाहर आते हैं।यांत्रिक हार्वेस्टर बड़े ट्रैक्टर होते हैं जिन्हें अंगूर की बेलों की जाफरियों के सामने खड़ा कर दिया जाता है और फिर मजबूत प्लास्टिक या रबर की छड़ का उपयोग कर अंगूर की बेल के फल लगे क्षेत्रों में चोट करते हैं जिससे कि अंगूर रेकिस से अलग हो जाते हैं। यांत्रिक हार्वेस्टर की यह विशेषता होती है कि ये अंगूर के बाग़ के एक बड़े क्षेत्र को अपेक्षाकृत कम समय में कवर करते हैं और हार्वेस्ट किये गए प्रत्येक टन में कामगारों की कम से कम संख्या लगानी पड़ती है। यांत्रिक हार्वेस्टिंग का एक नुकसान यह है कि इस उत्पाद में बाहरी गैर-अंगूर वाली चीजें विशेष रूप से पत्तियों की डालियाँ और पत्तियाँ अंधाधुंध मिलाई जाती हैं, लेकिन साथ ही जाफरी प्रणाली और अंगूर के बेल की कैनोपी के प्रबंधन के आधार पर इसमें खराब अंगूर, केन्स, धातु के मलबे, चट्टानें और और यहाँ तक कि छोटे जानवरों और चिड़ियों के घोंसले शामिल हो सकते हैं। कुछ वाइन निर्माता हार्वेस्ट किये गए फलों में इस तरह की चीजों के मिलने से रोकने के लिए यांत्रिक हार्वेस्टिंग से पहले अंगूर की बेलों से पत्तियों और खुले मलबों को हटा लेते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में फलों को अंधाधुंध तोड़े जाने और अंगूर के रस के ज्यादा ऑक्सीकरण के कारण उच्च कोटि की वाइन तैयार करने के लिए यांत्रिक हार्वेस्टिंग का उपयोग शायद ही कभी किया जाता है। अन्य देशों (जैसे कि ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में) सामान्य श्रमिकों की कमी के कारण आम तौर पर प्रीमियम वाइनग्रेप्स की यांत्रिक हार्वेस्टिंग का उपयोग कहीं अधिक किया जाता है।एक यांत्रिक डेस्टेममिंग का केंद्रीय घटक. छोटे गोलाकार हिस्सों के ऊपर लगे पैडल तने के बड़े टुकड़ों को हटाने के लिए घूमते हैं। अंगूर तने से तोड़ लिए जाते हैं और छिद्र में गिर जाते हैं। एक छोटी मात्रा में तने के टुकड़ों को अंगूर के साथ रखा जाता है ताकि टैनिन संरचना प्राप्त की जा सके.मैनुअल हार्वेस्टिंग का मतलब है अंगूर की बेलों से अंगूर के गुच्छों को हाथ से तोड़ना. संयुक्त राज्य अमेरिका में परंपरागत रूप से अंगूरों को तोड़कर 30 पाउंड के बक्से में डाला जाता है और कई मामलों में इन बक्सों को वाइनरी तक ले जाने के लिए आधे टन या दो टन के डिब्बों में रखा जाता है। मैनुअल हार्वेस्टिंग का फ़ायदा यह है कि इसमें जानकार श्रमिकों का इस्तेमाल ना केवल अंगूर के पके हुए गुच्छों को तोड़ने के लिए बल्कि कच्चे गुच्छों या जिन गुच्छों में सड़े हुए अंगूर या अन्य दोषयुकी गुच्छों को छोड़ने के लिए भी किया जाता है। यह वाइन के एक भण्डार या टैंक को निम्न गुणवत्ता के फल से दूषित होने से रोकने के लिए सुरक्षा का पहला प्रभावी उपाय हो सकता है।डीस्टेमिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें अंगूर के तनों को अंगूरों से अलग किया जाता है। वाइन बनाने के तरीके के आधार पर तैयार होने वाली वाइन में टैनिन के विकास और वनस्पति के जायके को कम करने के उद्देश्य से अंगूर को पिसे जाने से पहले यह प्रक्रिया पूरी की जाती है। जैसा कि कुछ जर्मन ट्रोकेनबीयरेनौस्लीज के साथ किया जाता है, सिंगल बेरी हार्वेस्टिंग में इस चरण को नज़रअंदाज किया जाता है और अंगूरों को एक-एक करके चुना जाता है।क्रशिंग और प्राथमिक फर्मेंटेशन (किण्वन)संपादित करेंमुख्य लेख: Fermentation (wine) Vnita punjabक्रशिंग वह प्रक्रिया है जिसमें बेरियों को अच्छी तरह निचोड़ लिया जाता है और बेरियों के तत्वों को अलग करने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए छिलकों को तोड़ा जाता है। डीस्टेमिंग अंगूर के रेकिस (वह तना जिसमें अंगूर लगे रहते हैं) से अंगूरों को अलग करने की एक प्रक्रिया है। पारंपरिक और छोटे-पैमाने पर वाइन बनाने में हार्वेस्ट किये गए अंगूरों को कभी-कभी नंगे पैरों से रौंद कर या सस्ते छोटे स्तर के क्रशरों का इस्तेमाल कर इनकी पिसाई की जाती है। साथ ही साथ इन्हें डीस्टेम भी किया जा सकता है। हालांकि बड़े वाइनरियों में एक यांत्रिक क्रशर/डीस्टेमर का इस्तेमाल किया जाता है। रेड और व्हाइट वाइन तैयार करने के लिए डीस्टेमिंग का निर्णय अलग-अलग तरीके से लिया जाता है। आम तौर पर व्हाइट वाइन बनाते समय केवल फल की पिसाई की जाती है, इसके बाद तनों को बेरियों के साथ प्रेस में रखा जाता है। मिश्रण में तनों की उपस्थिति रस को पहले निकाले गए छिलकों से होकर प्रवाहित कर दबाव डालने की सुविधा प्रदान करती है। ये प्रेस के किनारे पर जमा हो जाते हैं। रेड वाइन तैयार करने के लिए अंगूरों के तनों को आम तौर पर फर्मेंटेशन से पहले निकाल लिया जाता है क्योंकि तनों में टैनिन तत्व की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा होती है; टैनिन के अलावा ये वाइन को एक वानस्पतिक गंध भी दे सकते हैं (2-मेथॉक्सी-3-आइसोप्रोपाइलपायराजिन के निकलने के कारण, जिसमें हरी बेल मिर्च के जैसी एक गंध होती है।) कई बार जब अंगूरों में स्वयं उम्मीद से कम टैनिन की मात्रा मौजूद होती है तो वाइन निर्माता इन्हें छोड़ देने का निर्णय ले सकते हैं। यह तब और अधिक स्वीकार्य हो जाता है जब तने "पके हुए" होते हैं और भूरे रंग में बदलना शुरू हो जाते हैं। अगर अधिक मात्रा में छिलके निकालने की जरूरत होती है तो वाइन निर्माता डीस्टेमिंग के बाद अंगूरों की पिसाई का विकल्प चुन सकता है। तनों को पहले निकालने का मतलब है तनों के टैनिन को निकाला नहीं जा सकता है। इन मामलों में अंगूरों को दो रोलरों के बीच से गुजारा जाता है जो अंगूरों को इतना निचोड़ लेते हैं कि इनके छिलके और पल्प अलग-अलग हो जाते हैं लेकिन इतना अधिक भी नहीं कि छिलकों के उत्तकों में जरूरत से ज्यादा टूट-फूट या काट-छांट हो जाए. कुछ मामलों में आंशिक कार्बनिक मैसरेशन के जरिये फल जैसी सुगंध को बरकरार रखने को प्रोत्साहित करने के लिए उल्लेखनीय रूप से "नाजुक" रेड वेरियेटल्स जैसे कि पीनॉट नॉयर या साइरा के मामले में अंगूरों के पूरे या कुछ हिस्से को बगैर पिसा हुआ छोड़ दिया जाता है (जिसे "होल बेरी" कहते हैं).क्रशर से बाहर निकलते हुए कुचले गए अंगूर.ज्यादातर रेड वाइन अपना रंग अंगूर के छिलकों से प्राप्त करते हैं (इसका अपवाद नॉन-विनिफेरा वाइन्स की किस्में या हैब्रिड्स हैं जिनमें डार्क माल्विदिन 3,5-डाइग्लूकोसाइड एंथोसायनिन के धब्बों के साथ रस मौजूद होते हैं) और इसीलिये रंग को निकालने के लिए रस और छिलके के बीच संपर्क होना आवश्यक है। रेड वाइन अंगूरों की डीस्टेमिंग और क्रशिंग कर एक टैंक में तैयार की जाती है और फर्मेंटेशन (मैसरेशन) की सम्पूर्ण प्रक्रिया के दौरान छिलकों को रस के संपर्क में रहने दिया जाता है। बगैर पिसे हुए फलों पर बहुत तेजी से दबाव डालकर (फास्टिडियस प्रेसिंग) लाल अंगूरों से सफ़ेद (रंगहीन) वाइन को तैयार किया जा सकता है। इससे अंगूर के रस और छिलकों के बीच संपर्क कम हो जाता है (जैसा कि ब्लैंक डी नॉयर्स बुलबुलेदार वाइन बनाने में किया जाता है जिसे एक लाल विनिफेरा अंगूर, पिनॉट नॉयर से तैयार किया जाता है।)ज्यादातर व्हाइट वाइन डीस्टेमिंग या क्रशिंग के बगैर तैयार किये जाते हैं और इन्हें उठाने वाले डब्बों से सीधे प्रेस में स्थानांतरित कर दिया जाता है। ऐसा छिलकों या अंगूर के बीजों से किसी भी तरह टैनिन को निकलने से बचाने के साथ-साथ खुली हुई बेरियों की बजाय अंगूर के गुच्छों के एक मैट्रिक्स के जरिये रस के समुचित प्रवाह को कायम रखने के लिए किया जाता है। कुछ परिस्थितियों में वाइन निर्माता सफ़ेद अंगूरों को थोड़ी देर के लिए, आम तौर पर तीन से 24 घंटों के लिए छिलकों के संपर्क में पिसाई का विकल्प चुन सकते हैं। इससे छिलकों से जायके और टैनिन को निकालने (बहुत ज्यादा बेंटोनाइट मिलाये बगैर प्रोटीन के अवक्षेपण को प्रोत्साहित करने के लिए टैनिन को निकाल लिया जाता है) के साथ-साथ पोटेशियम आयन को निकालने में मदद मिलती है जो बाइटारटेरेट अवक्षेपण (टार्टर की क्रीम बनने) में भाग लेते हैं। इसके परिणाम स्वरूप जूस का पीएच (pH) भी बढ़ जाता है जो बहुत अधिक अम्लीय अंगूरों के लिए वांछनीय हो सकता है। यह आज की तुलना में 1970 के दशक में एक आम उपाय था, हालांकि अभी भी कैलिफोर्निया में कुछ सॉविग्नोन ब्लॉन्क और चार्दोने उत्पादकों द्वारा इस तरीके को आजमाया जाता है।रोज़ वाइन्स के मामले में फलों की पिसाई की जाती है और गहरे छिलकों को रस के संपर्क में उतनी देर तक रहने दिया जाता है जब तक कि उतना रंग ना निकल आये जितना कि वाइन निर्माता चाहता है। इसके बाद मस्ट (पल्प) को दबाया जाता है और फर्मेंटेशन की प्रक्रिया इस तरह पूरी की जाती है मानो कि वाइन निर्माता एक व्हाइट वाइन तैयार कर रहा था।खमीर सामान्य रूप से पहले से ही अंगूरों पर मौजूद रहती है जो अक्सर अंगूरों के बुकनीदार स्वरूप में दिखाई देता है। फर्मेंटेशन की प्रक्रिया इस प्राकृतिक खमीर के साथ पूरी की जा सकती है लेकिन चूंकि बिलकुल सटीक किस्म के मौजूद खमीर के आधार पर यह एक अप्रत्याशित परिणाम दे सकता है इसीलिये मस्ट के साथ अक्सर संवर्धित खमीर को मिलाया जाता है। वाइल्ड फर्मेंट्स के इस्तेमाल में आने वाली एक प्रमुख समस्या है फर्मेंटेशन की सम्पूर्ण प्रक्रिया पूरी होने में विफलता, जिसमिन शर्करा के कुछ अवशेष फर्मेंटेशन के बगैर रह जाते हैं। ऐसे में जब ड्राई वाइन प्राप्त करना होता है तो यह वाइन को मीठा बना सकता है। लगातार वाइल्ड फर्मेंट्स के कारण बाइ प्रोडक्ट के रूप में एक अप्रिय एसिटिक एसिड (विनेगार) उत्पन्न हो सकता है।फर्मेंटिंग रेड वाइन की सतह पर अंगूर के छिलकों की एक टोपी सी बन जाती है।प्राथमिक किण्वन के दौरान खमीर की कोशिकाएं मस्ट (पल्प) में मौजूद शर्करा पर पलती हैं और इसी कारण कार्बन डाइऑक्साइड गैस और अल्कोहल का उत्पादन कई गुणा बढ़ जाता है। किण्वन के दौरान तापमान का स्तर अंतिम उत्पाद के स्वाद के साथ-साथ किण्वन की गति दोनों को प्रभावित करता है। रेड वाइन के लिए तापमान आम तौर पर 22 से 25 डिग्री सेल्सियस तक और व्हाइट वाइन के लिए 15 से 18 डिग्री सेल्सियस तक होता है।[2] रूपांतरित किये गए प्रत्येक ग्राम शर्करा के लिए अल्कोहल की आधा ग्राम मात्रा तैयार होती है, इसीलिये 12% की अल्कोहल सांद्रता प्राप्त करने के लिए मस्ट में लगभग 24% शर्करा की मात्रा मौजूद होनी चाहिए. मस्ट में शर्करा की प्रतिशत मात्रा की गणना मापे गए घनत्व, मस्ट के वजन और एक विशिष्ट प्रकार के हाइड्रोमीटर की मदद से की जाती है जिसे सैकारोमीटर कहते हैं। अगर अंगूरों में शर्करा की मात्रा बहुत ही कम होती है जिससे कि अल्कोहल की वांछित प्रतिशत मात्रा प्राप्त नहीं हो पाती है तो ऐसे में चीनी मिलाई जा सकती है (चैप्टलाइजेशन). व्यावसायिक तौर पर वाइन तैयार करने में चैप्टलाइजेशन स्थानीय विनियमों के अधीन है।अल्कोहलिक फर्मेंटेशन के दौरान या बाद में मेलोलैक्टिक फर्मेंटेशन की प्रक्रिया भी पूरी की जाती है जिसके दौरान बैक्टेरिया के विशिष्ट स्ट्रेंस मैलिक एसिड को अपेक्षाकृत हल्के लैक्टिक एसिड में बदल देते हैं। इस प्रकार का फर्मेंटेशन अक्सर वांछित बैक्टीरिया के टीकों द्वारा शुरू किया जाता है।प्रेसिंगसंपादित करेंमिडगल हाएमेक में एक प्राचीन वाइनप्रेस, जिसका प्रेस करने वाला हिस्सा मध्य में है और एकत्रण करने वाला हिस्सा निचले बाएं सिरे पर है।प्रेसिंग अंगूरों या अंगूर के छिलकों से रस या वाइन अलग करने के क्रम में अंगूरों या पोमैस पर दबाव डालने की एक प्रक्रिया है। वाइन बनाने में प्रेसिंग हमेशा एक आवश्यक कार्य नहीं होता है, जब अंगूरों की पिसाई होती है तो रस एक पर्याप्त मात्रा में तुरंत अलग हो जाता है (जिसे फ्री-रन जूस कहते हैं) जिसे विनिफिकेशन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। आम तौर पर यह फ्री-रन जूस दबाकर निकाले गए रस की तुलना में उन्नत कोटि का होता है। हालांकि ज्यादातर वाइनरियाँ अपने (गैलन) प्रति टन उत्पादन को बढाने के लिए प्रेसों का उपयोग करती हैं क्योंकि प्रेस से निकाला गया रस अंगूर से निकाले गए रस की कुल मात्रा के 15%-30% का प्रतिनिधित्व कर सकता है।प्रेस की कार्यप्रणाली में अंगूर के छिलकों या साबुत अंगूर के गुच्छों को एक कठोर स्थिर सतह और एक गतिशील सतह के बीच रखा जाता है और दोनों सतहों के बीच आयतन धीरे-धीरे कम होता जाता है। आधुनिक प्रेस प्रत्येक चक्र प्रेस पर लगाने वाले समय और दबाव को निर्धारित करते हैं जो आम तौर पर 0 बार से 2.0 के बीच नियंत्रित रहती है। कभी-कभी वाइन निर्माता ऐसे दबाव को चुनते हैं जो प्रेस किये गए रस के प्रवाह को अलग कर देता है जिसे "प्रेस कट" तैयार करना कहते है। चूंकि दबाव छिलकों से निकले टैनिन की मात्रा को बढ़ा देता है जिससे रस में इसकी मात्रा बढ़ जाती है, इसीलिये प्रेस किया गया रस अक्सर बहुत अधिक टैनिक या कड़क हो जाता है। बेरी में अंगूर के रस के तत्वों की स्थिति के कारण (पानी और अम्ल मुख्य रूप से मिजोकार्प या पल्प में पाया जाता है, जबकि टैनिन मुख्यतः पेरिकार्प या छिलकों या बीजों में मौजूद होते हैं) प्रेस किये गए रस या वाइन में अम्ल की मात्रा कम हो जाती है और फ्री-रन जूस की तुलना में इसका पीएच (pH) मान ज्यादा होता है।आधुनिक तरीके से वाइन उत्पादन की शुरुआत से पहले ज्यादातर प्रेस लकड़ी से बने बास्केट प्रेस होते थे और इन्हें हाथों से संचालित किया जाता था। बास्केट प्रेस एक निर्धारित प्लेट के ऊपर लकड़ी के स्लैट्स के एक सिलेंडर से बने होते हैं जिसमें एक चलायमान प्लेट होता है जिसे नीचे की ओर धकेला जा सकता है (आम तौर पर एक सेन्ट्रल रैचेटिंग थ्रेडेड स्क्रू द्वारा). प्रेस संचालक अंगूरों या पोमैस को लकड़ी के सिलेंडर में भर देता है, ऊपरी प्लेट को अपनी जगह पर रख देता है और इसे तब तक नीचे किये रहता है जब तक की रस लकड़ी के स्लैट्स से प्रवाहित नहीं होने लगता है। जब रस का प्रवाह कम हो जाता है तो प्लेट को एक बाद फिर रेचेट कर नीचे लाया जाता है। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है जब तक कि प्रेस संचालक यह नहीं तय कर लेता है कि प्रेस किये गए रस या वाइन की गुणवता मानक स्तर से कम हो गयी है या समूचा रस दबाकर निकाल लिया गया है। 1990 के दशक की शुरुआत से ऐतिहासिक बास्केट प्रेसों की अच्छी तरह प्रेसिंग को दोहराने की चाह में उच्चस्तरीय-अंतिम उत्पादकों के जरिये आधुनिक यांत्रिक बास्केट प्रेसों को पुनर्जीवित किया गया है। क्योंकि बास्केट प्रेस एक अपेक्षाकृत कॉम्पैक्ट डिजाइन के होते हैं, प्रेस केक रस के प्रेस से निकलने से पहले प्रवाहित होने के लिए एक अपेक्षाकृत लंबा मार्ग प्रदान करता है। बास्केट प्रेस की वकालत करने वालों का यह मानना है कि अंगूर या पोमैस केक से होकर गुजरने वाला यह अपेक्षाकृत लंबा मार्ग उन ठोस पदार्थों के लिए एक फ़िल्टर के रूप में कार्य करता है जो अन्यथा प्रेस जूस की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।वर्ल्ड हेरिटेज वाइनयार्ड्स के सामने लकड़ी की एक प्राचीन वाइन प्रेस.रेड वाइन के मामले में प्राथमिक किण्वन के बाद मस्त को प्रेस किया जाता है जो घोल में से छिलकों या अन्य ठोस पदार्थों को अलग कर देता है। व्हाइट वाइन की स्थिति में घोल को किण्वन से पहले मस्ट से अलग कर लिया जाता है। रोज़ वाइन के मामले में वाइन को रंग देने के लिए छिलकों को एक छोटी अवधि के लिए इसके संपर्क में रहने दिया जाता है, ऐसी स्थिति में मस्ट को भी प्रेस किया जा सकता है। वाइन को कुछ समय तक रखने या पुराना होने देने के बाद, वाइन को मृत खमीर और बचे हुए किसी भी ठोस पदार्थ (जिसे लीस कहते हैं) से अलग कर लिया जाता है और इसे एक नए कंटेनर में स्थानांतरित कर दिया जाता है जहाँ फर्मेंटेशन की अतिरिक्त प्रक्रियाओं को पूरा किया जा सके.पिजियेजसंपादित करेंपिजियेज खुले किण्वन टैंकों में अंगूरों की परंपरागत स्टोम्पिंग के लिए वाइन उत्पादन का एक फ्रांसीसी शब्द है। कुछ विशेष प्रकार का वाइन तैयार करने के लिए अंगूरों को एक क्रशर में डालकर चलाया जाता है और उसके बाद इस रस को खुले किण्वन टैंकों में निकाल लिया जाता है। किण्वन शुरू हो जाने के बाद अंगूर के छिलकों को किण्वन की प्रक्रिया में निकले कार्बन डाइऑक्साइड गैसों द्वारा सतह की ओर धकेल दिया जाता है। छिलकों और अन्य ठोस पदार्थों की इस परत को कैप के रूप में जाना जाता है। चूंकि छिलके टैनिन्स के स्रोत होते हैं, कैप को प्रतिदिन घोल में मिश्रित किया जाता है या पारंपरिक रूप से वैट के माध्यम से स्टोम्पिंग द्वारा "पंच" किया जाता है।शीत और ताप स्थिरीकरणसंपादित करेंइन्हें भी देखें: Clarification and stabilization of wineशीत स्थिरीकरण (कोल्ड स्टेबिलाइजेशन) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका उपयोग वाइन बनाते समय वाइन से टारट्रेट क्रिस्टलों (सामान्यतः पोटेशियम बाइटारट्रेट) को कम करने में किया जाता है। ये टारट्रेट क्रिस्टल रेत के साफ़ कणों जैसे दिखाई देते हैं और इन्हें "वाइन क्रिस्टल" या वाइन "डायमंड" के नाम से भी जाना जाता है। इनका निर्माण टारटेरिक अम्ल और पोटेशियम पोटेशियम के संयोग से होता है और ये वाइन में तलछट के रूप में दिखाई देते हैं हालांकि ये तलछट नहीं होते हैं। किण्वन के बाद शीत स्थिरीकरण प्रक्रिया के दौरान वाइन के तापमान को 1-2 सप्ताह तक हिमांक बिंदु (फ्रीजिंग) तक गिरा दिया जाता है। इससे क्रिस्टल वाइन से अलग हो जाते हैं और पात्र (होल्डिंग वेसेल) के किनारों से चिपक जाते हैं। जब वाइन पात्र से निकाली जाती है टारट्रेट पात्र में ही रह जाते हैं। इनका निर्माण उन वाइन की बोतलों में भी हो सकता है जिनका भंडारण अत्यंत ठंडी परिस्थितियों में किया गया हो."ताप स्थिरीकरण" के दौरान अस्थिर प्रोटीनों को बेंटोनाइट में अवशोषित करके अलग पृथक कर लिया जाता है, इस तरह उन्हें बोतलबंद वाइन में अवक्षेपित होने से बचाया जाता है।[2]द्वितीयक किण्वन और समूह परिपक्वन (सेकंडरी फर्मेंटेशन और बल्क एजिंग)संपादित करेंथ्री कौइर्स विनयार्ड, ग्लूस्टरशायर, इंग्लैंड में स्टेनलेस स्टील फर्मेंटेशन वेसेल तथा नए ओक बैरलद्वितीयक किण्वन और परिपक्वन प्रक्रिया के दौरान, जिसमें तीन से छः महीने लगते हैं, किण्वन की प्रक्रिया बहुत धीरे-धीरे जारी रहती है। वाइन को ऑक्सीकरण से बचाने के लिए वाइन एक वायुरोधक (एयरलॉक) में रखी जाती है। अंगूरों के प्रोटीनों का विखंडन होता है और शेष खमीर कोशिकाओं एवं दूसरे महीन कणों को तलछट में बैठने दिया जाता है। पोटेशियम बाइटारट्रेट भी तलछट में बैठ जाएगा, बोतलबंद करने के बाद (हानिरहित) टारट्रेट क्रिस्टलों को प्रकट होने से बचाने के लिए प्रक्रिया को शीत स्थिरीकरण के ज़रिये और बढ़ाया जा सकता है। इन प्रक्रियाओं का परिणाम यह होता है कि धुंधली वाइन साफ़ दिखने लगती है। मैल को हटाने के लिए इस प्रक्रिया के दौरान वाइन को निचोड़ा भी जा सकता है।द्वितीयक किण्वन आम तौर पर या तो कई घन मीटर आयतन वाले जंगरोधी स्टील के बर्तनों में या ओक के बैरलों में होता है, यह वाइन उत्पादक के उद्देश्यों पर निर्भर करता है। ओक रहित वाइन को स्टेनलेस स्टील या दूसरे ऐसे पदार्थ के बैरलों में किण्वित किया जाता है जिनका वाइन के अंतिम स्वाद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. इच्छित स्वाद के अनुसार इसे स्टेनलेस स्टील में किण्वित करके थोड़े समय के लिए ओक में रखा जा सकता है या फिर पूरा किण्वन स्टेनलेस स्टील के बर्तन में ही किया जा सकता है। पूरी तरह से लकड़ी के बैरलों की बजाय ग़ैर-लकड़ी के बैरल में ओक की चिप्पियों को मिलाया जा सकता है। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से सस्ती वाइन में इस्तेमाल की जाती हैशौकिया वाइन बनाने वाले अक्सर वाइन उत्पादन के लिए शीशे की बड़ी बोतलों (कारबॉयज) का इस्तेमाल करते हैं; इन बोतलों (जिन्हें कभी-कभी डेमीजॉन्स कहा जाता है) की क्षमता 4.5 से 54 लीटर (1.2-14.3 अमेरीकी गैलन) तक होती है। इस्तेमाल किये जाने वाले पात्र का प्रकार, बनाई जाने वाली वाइन की मात्रा, इस्तेमाल किये जाने वाले अंगूरों और वाइन निर्माता के इरादों पर निर्भर करता है।मेलोलैक्टिक किण्वनसंपादित करेंमेलोलैक्टिक किण्वन तब होता है जब लैक्टिक अम्ल के जीवाणु मैलिक अम्ल को उपापचय (मेटाबोलाइज) कर लैक्टिक अम्ल और कार्बन डाईआक्साइड बनाते हैं। यह क्रिया या तो स्वेच्छा से पूरी की जाती है जिसमें विशेष रूप से संवर्धित किये गए जीवाणुओं की प्रजाति को परिपक्व हो रही वाइन में मिलाया जाता है या फिर यह क्रिया संयोगवश भी हो सकती है अगर असंवर्धित लैक्टिक अम्ल के जीवाणु पहले से ही मौजूद हों.मेलोलैक्टिक किण्वन उस वाइन के स्वाद को बेहतर बना सकता है जिसमें मैलिक अम्ल का स्तर अधिक हो क्योंकि मैलिक अम्ल की अधिक सांद्रता आम तौर पर अरुचिकर और तीखे स्वाद के एहसास की वजह बनती है, जबकि लैक्टिक अम्ल अधिक हल्का और कम तीखा माना जाता है।यह प्रक्रिया अधिकतर रेड वाइन में इस्तेमाल की जाती है जबकि व्हाइट वाइन में यह विवेकाधीन होती है।प्रयोगशाला संबंधी परीक्षणसंपादित करेंवाइन चाहे टैंकों में परिपक्व हो रही हो या बैरलों में, वाइन की स्थिति जानने के लिए समय-समय पर प्रयोगशाला मे परीक्षण किये जाते हैं। सामान्य परीक्षणों में °ब्रिक्स, पीएच (pH), टाइट्रेटेबल एसिडिटी, अवशिष्ट शर्करा, मुक्त या उपलब्ध सल्फर, कुल सल्फर, वाष्पीय अम्लता और अल्कोहल प्रतिशत शामिल हैं। अतिरिक्त परीक्षणों में टार्टर के क्रीम का क्रिस्टलीकरण (पोटेशियम हाईड्रोजन टारट्रेट) और ताप अस्थिर प्रोटीन का अवक्षेपण शामिल है, यह अंतिम परीक्षण केवल व्हाइट वाइनों तक ही सीमित है। ये परीक्षण अक्सर वाइन बनाने की पूरी अवधि में और बोतलीकरण से पहले भी संपादित किये जाते हैं। इन परीक्षणों के परिणामों की प्रतिक्रिया में तब वाइन निर्माता सही उपचार प्रक्रिया के बारे में निर्णय ले सकता है, उदाहरण के लिए अधिक मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड को मिलाना. संवेदी परीक्षण भी किये जाते हैं और फिर इनके आधार पर वाइन निर्माता उपचारात्मक कदम उठा सकता है जैसे की वाइन के स्वाद को नरम करने के लिए प्रोटीन मिलाना.ब्रिक्स अंगूर के रस में ठोस घुलनशील का एक मापक है और यह केवल शर्करा का ही नहीं बल्कि कई दूसरे घुलनशील पदार्थों का भी प्रतिनिधित्त्व करता है, जैसे कि लवण, अम्ल और टैनिन, जिन्हें कभी-कभी पूर्ण घुलनशील ठोस (टीएसएस) कहा जाता है। हालांकि शर्करा सबसे ज्यादा मात्र में उपस्थित रहने वाला यौगिक है और इसलिए सारे व्यवहारिक उद्देश्यों से ये इकाइयां शर्करा स्तर का एक मापन हैं। अंगूरों में शर्करा का स्तर केवल इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि यह वाइन में अंतिम रूप से अल्कोहल के अंश का निर्धारण करता है बल्कि इसलिए भी कि यह अंगूरों की परिपक्वता का अप्रत्यक्ष सूचकांक है। ब्रिक्स (संक्षेप में बीएक्स (Bx)) घोल के ग्राम के प्रति 100 ग्राम में मापा जाता है, इसलिए 20 Bx का मतलब है कि 100 ग्राम रस में 20 ग्राम घुलनशील यौगिक मौजूद हैं। अंगूरों में शर्करा की मात्रा के दूसरे सामान्य मापक भी हैं, स्पेसिफिक ग्रेविटी (विशिष्ट घनत्व), ईशले (जर्मनी) और ब्यूम (फ़्रांस). फ्रांसीसी ब्यूम (संक्षेप में Be° या Bé°) में यह लाभ है कि एक Bé° लगभग एक प्रतिशत अल्कोहल का मान देता है। साथ ही एक Be° 1.8 ब्रिक्स के बराबर होता है यानी प्रति सौ ग्राम में 1.8 ग्राम शर्करा. इससे यह निर्णय लेने में मदद मिलती है कि अगर रस में शर्करा कम है तो एक प्रतिशत अल्कोहल पाने के लिए प्रति 100 मि.ली. में 1.8 ग्राम मिलाया जाए या 18 ग्राम प्रति लीटर. इस प्रक्रिया को चेप्टलाइजेशन कहा जाता है और यह कई देशों में अवैध है (लेकिन घरेलू वाइन उत्पादकों के लिए पूर्णतः स्वीकार्य है). आम तौर पर ड्राई टेबल वाइन बनाने के लिए 20 से 25 के बीच Bx वांछनीय है (11 से 14 Be° के समतुल्य).शर्करा की मात्रा को देखने के लिए तुरंत संकेत अंक हासिल करने के क्रम में ब्रिक्स परीक्षण या तो प्रयोगशाला में या खेतों में ही किया जा सकता है। ब्रिक्स को आम तौर पर रेफ्रेक्टोमीटर से मापा जाता है जबकि दूसरी विधियाँ हाईड्रोमीटर का प्रयोग करती हैं। सामान्यतः हाईड्रोमीटर एक सस्ता विकल्प है। शर्करा के अधिक शुद्ध मापन के लिए लिए यह याद रखना ज़रूरी है कि सभी मापन उस तापमान से प्रभावित होते हैं जिस तापमान पर रीडिंग ली गयी है। उपकरणों के आपूर्तिकर्ता आम तौर पर संशोधन चार्ट उपलब्ध करवाते हैं।वाष्पशील अम्लता परीक्षण वाइन में वाष्प द्वारा आसवित होने वाले अम्ल की किसी तरह की उपस्थिति को सुनिश्चित करता है। एसिटिक एसिड मुख्य रूप से मौजूद होता है लेकिन लैक्टिक, ब्यूटिरिक, प्रोपियोनिक और फॉर्मिक एसिड भी पाए जा सकते हैं। आम तौर पर यह परीक्षण इन अम्लों की जाँच एक कैश स्टील में करता है लेकिन एचपीसीएल, गैस क्रोमैटोग्राफी और एंजाइमेटिक विधि जैसे नए तरीके उपलब्ध हैं। अंगूरों में पायी जाने वाली वाष्पशील अम्लता की मात्रा नगण्य होती है क्योंकि यह सूक्ष्मजीवों के उपापचय का एक बाइ-प्रोडक्ट होता है। यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि एसिटिक एसिड जीवाणु को विकसित होने के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। वाइन के कंटेनरों में से हवा को पूरी तरह निकाल लेने के अलावा सल्फर डाइऑक्साइड मिलाने से जीवाणुओं के विकसित होने की गति नियंत्रित हो जाती है। खराब अंगूरों को निकाल देने से भी एसिटिक एसिड जीवाणु से संबंधित समस्याओं से बचा जा सकता है। सल्फर डाइऑक्साइड के प्रयोग और कम वाष्प अम्ल (वी.ए.) उत्पादित करने वाले सैकारोमाइसेज के अंश को मिलाने से एसिटिक एसिड उत्पादन करने वाली खमीर प्रभावित हो सकती है। वाइन से अस्थिर अम्लता को हटाने के लिए एक अपेक्षाकृत नया तरीका रिवर्स ऑस्मोसिस है। सम्मिश्रण (ब्लेंडिंग) से भी मदद मिल सकती है - उच्च वाष्पशील अम्लता (वी.ए.) वाली वाइन को छानकर (जिम्मेदार सूक्ष्म जीवों को हटाने के लिए) कम वाष्पशील अम्लता (वी.ए.) वाली वाइन में मिलाया जा सकता है ताकि एसिटिक एसिड का स्तर संवेदी सीमा से नीचे रहे.ब्लेंडिंग और फाइनिंग (मिश्रण और शोधन)संपादित करेंवांछित स्वाद प्राप्त करने के क्रम में बॉटलिंग से पहले विभिन्न बैचों के वाइन को मिश्रित किया जा सकता है। वाइन निर्माता विभिन्न परिस्थितियों में तैयार किए गए विभिन्न अंगूरों और बैचों के वाइनों को मिश्रित कर कथित कमियों को दूर कर सकता है। इस तरह के समायोजन अम्ल या टैनिन के स्तरों के समायोजन की तरह अत्यंत सरल और एक सुसंगत स्वाद प्राप्त करने के लिए विभिन्न किस्मों या विंटेजेज की ब्लेंडिंग की तरह अत्यंत जटिल भी हो सकते हैं।वाइन उत्पादन के दौरान टैनिन्स को हटाने, कसैलापन को दूर करने और उन सूक्ष्मदर्शी कणों को निकालने के लिए जो वाइन को खराब कर सकते हैं, फाइनिंग एजेंट्स का इस्तेमाल किया जाता है। कौन सा फाइनिंग एजेंट इस्तेमाल किया जाना है यह वाइन निर्माता द्वारा तय किया जाता है और इसमें अलग-अलग उत्पाद के अनुसार और यहाँ तक कि अलग-अलग बैच के अनुसार अंतर हो सकता है (आम तौर पर यह उस विशेष वर्ष के अंगूरों पर निर्भर करता है).[3]वाइन उत्पादन में जिलेटिन का उपयोग सदियों से किया जा रहा है और इसे वाइन के शोधन या शुद्धिकरण के लिए एक पारंपरिक विधि के रूप में मान्यता दी जाती है। यह टैनिन तत्व को कम करने के लिए भी आम तौर पर सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला एजेंट है। सामान्यतः वाइन में कोई भी जिलेटिन बचा नहीं रह जाता है क्योंकि यह वाइन के तत्वों के साथ प्रतिक्रया करता है, क्योंकि शुद्धिकरण के बाद यह एक तलछट बनाता है जिसे बॉटलिंग से पहले छानकर निकाल दिया जाता है।जिलेटिन के अलावा वाइन के लिए अन्य फाइनिंग एजेंटों को अक्सर जानवरों या मछलियों के उत्पादों से तैयार किया जाता है जैसे कि माइक्रोनाइज्ड पोटैशियम कैसिनेट (कैसिन दूध का प्रोटीन है), अण्डों के सफ़ेद भाग, हड्डियों की राख, बैल का रक्त, इसिंग्लास (स्ट्रजन ब्लैडर), पीवीपीपी (एक कृत्रिम यौगिक), लाइसोजाइम और स्किम मिल्क पाउडर.[3]कुछ सुगंधि युक्त वाइनों में शहद या अंडे के यॉक से निकाले गए तत्व मौजूद होते हैं।[3]गैर-पशु-आधारित फिल्टरिंग एजेंटों को भी अक्सर इस्तेमाल किया जाता है जैसे कि बेंटोनाइट (एक ज्वालामुखी संबंधी मिट्टी से बना फिल्टर), डायएटमेशियस अर्थ, सेलूलोज़ पैड, कागज के फिल्टर और झिल्लीदार फिल्टर (सामान आकार की छिद्रों वाली प्लास्टिक पॉलीमर सामग्री की पतली फिल्में).परिरक्षक (प्रेजरवेटिव्स)संपादित करेंवाइन बनाने में इस्तेमाल होने वाले सबसे आम परिरक्षक है सल्फर डाइऑक्साइड जिसे सोडियम या पोटेशियम मेटाबाइसल्फेट मिलाकर प्राप्त किया जाता है। एक अन्य उपयोगी परिरक्षक पोटेशियम सोर्बेट है।सल्फर डाइऑक्साइड के दो प्रमुख कार्य हैं, पहला यह एक सूक्ष्मजीव रोधी एजेंट है और दूसरा यह एक ऑक्सीकरण रोधी है। व्हाइट वाइन तैयार करने में इसे किण्वन से पहले और अल्कोहलिक किण्वन की प्रक्रिया पूरी होने के तुरंत बाद मिलाया जा सकता है। अगर इसे अल्कोहलिक फारमेंट के बाद मिलाया जाता है तो यह मेलोलैक्टिक फर्मेंटेशन, बैक्टीरिया को होने वाले नुक़सान से बचा सकता है या इसे रोक सकता है और ऑक्सीजन के हानिकारक प्रभावों के खिलाफ सुरक्षा में मदद कर सकता है। 100 मिलीग्राम प्रति लीटर (सल्फर डाइआक्साइड के) तक मिलाया जा सकता है लेकिन उपलब्ध या स्वतंत्र सल्फर डाइआक्साइड को भी एस्पिरेशन विधि से मापा जाना चाहिए और इसे 30 मिलीग्राम प्रति लीटर पर समायोजित किया जाना चाहिए. उपलब्ध सल्फर डाइआक्साइड को बॉटलिंग के समय तक इस स्तर पर बनाए रखा जाना चाहिए. रोज़ वाइन्स के लिए इसे कम मात्रा में मिलाया जा सकता है और उपलब्धता स्तर 30 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक नहीं होना चाहिए.रेड वाइन तैयार करने में रंग को स्थिर होने देने के लिए फारमेंट से पहले सल्फर डाइऑक्साइड को उच्च स्तरों (100 मिलीग्राम प्रति लीटर) पर इस्तेमाल किया जा सकता है अन्यथा इसे मेलोलैक्टिक फारमेंट की समाप्ति पर उपयोग किया जाता है और यह उसी तरह कार्य करता है जैसा कि व्हाइट वाइन में करता है। हालांकि लाल धब्बों की ब्लीचिंग को रोकने के लिए कम मात्रा में (20 मिलीग्राम प्रति लीटर मान लें) इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए और कायम रहने वाला स्तर तकरीबन 20 मिलीग्राम प्रति लीटर होना चाहिए. इसके अलावा हल्के ऑक्सीकरण को दूर करने और एसिटिक एसिड जीवाणु के विकास को रोकने के लिए अल्कोहलिक फर्मेंट के बाद और मैलोलैक्टिक फर्मेंट से पहले रेड वाइन में इसकी छोटी मात्राएं (मानो कि 20 मिलीग्राम प्रति लीटर) मिलाई जा सकती हैं।सल्फर डाइऑक्साइड के उपयोग के बिना वाइन्स में आसानी से जीवाणुओं के नष्ट होने की समस्या उत्पन्न हो सकती है, भले ही वाइन तैयार करने का तरीका कितना ही स्वच्छ क्यों ना हो.पोटेशियम सोर्बेट, विशेष रूप से बोतलों में बंद मीठी वाइनों के लिए खमीर सहित कवक के विकास को नियंत्रित करने में प्रभावी होता है। हालांकि एक संभावित खतरा सोर्बेट के मेटाबोलिज्म से एक पोटेंट के जेरानियोल का है और यह बहुत ही अप्रिय उपोत्पाद (बाइ-प्रोडक्ट) है। इससे बचने के लिए या तो वाइन को स्टेराइल कर बोतलबंद किया जाना चाहिए या फिर इसमें इतना सल्फर डाइऑक्साइड होना चाहिए कि यह जीवाणु के विकास को रोक सके. स्टेराइल बॉटलिंग में फिल्टरेशन का उपयोग भी शामिल है।फिल्टरेशनसंपादित करेंवाइन बनाने में फिल्टरेशन का इस्तेमाल दो उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है, शुद्धिकरण और सूक्ष्मजीव स्थिरीकरण. शुद्धिकरण में वाइन के प्रत्यक्ष स्वरुप को प्रभावित करने वाले बड़े कणों को हटा लिया जाता है। सूक्ष्मजीव स्थिरीकरण में वाइन की स्थिरता को प्रभावित करने वाले जीवों को हटाया जाता है और इसलिए पुनः-किण्वन या नुक़सान की संभावना कम हो जाती है।शुद्धिकरण की प्रक्रिया का संबंध कणों को हटाने से है; खुरदरी पॉलिशिंग के लिए जो 5-10 माइक्रोमीटर से ज्यादा बड़े होते हैं, शुद्धि या पॉलिशिंग के लिए जो 1-4 माइक्रोमीटर से ज्यादा बड़े होते हैं। सूक्ष्मजीव स्थिरीकरण के लिए कम से कम 0.65 माइक्रोमीटर फिल्टरेशन की आवश्यकता होती है। हालांकि इस स्तर पर फिल्टरेशन वाइन के रंग और स्वरुप को हल्का कर सकते हैं। सूक्ष्मजीव स्थिरीकरण स्टेरिलिटी का संकेत नहीं देता है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि एक पर्याप्त मात्रा में खमीर और बैक्टीरिया को हटा लिया गया है।बोतलबंद करना (बॉटलिंग)संपादित करेंवाइन को सुरक्षित और बोतल में अवांछित किण्वन को रोकने में मदद करने के लिए अंत में सल्फाइट की कुछ मात्रा मिलायी जाती है। इसके बाद वाइन की बोतलों को पारंपरिक रूप से कॉर्क के जरिये सीलबंद किया जाता है, हालांकि वाइन को बोतलबंद करने के लिए वैकल्पिक उपाय भी आजमाए जाते हैं जैसे कि सिंथेटिक कॉर्क और स्क्रूकैप, जिनमे कॉर्क की गंदगी आने की संभावना कम होती है और ये तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।[4] अंत में बोतल के सिरे पर एक कैप्सूल[5] लगाया जाता है और मजबूती से सीलबंद करने के लिए उसे गर्म[6] किया जाता है।वाइन उत्पादक (वाइन मेकर्स)संपादित करेंपरंपरागत रूप से इन्हें विंटनर के के नाम से जाना जाता है; वाइन के उत्पादन में शामिल व्यक्ति को वाइनमेकर कहा जाता है। इन्हें आम तौर पर वाइनरियों या वाइन कंपनियों द्वारा नियुक्त किया जाता है।इन्हें भी देखेंसंपादित करेंफ्रांस में एक वाइन लेबलिंग मशीन.बाल वनिता महिला आश्रमवाइन संबंधी शब्दावलीवाइन में एसिडशैम्पेन का उत्पादनगवर्नोवाइन में शक्करसन्दर्भ

मदिरा उत्पादन से आशय मदिरा  (शराब) के उत्पादन की प्रक्रिया से है जो अंगूरों या अन्य सामग्रियों के चुनाव से शुरू होकर तैयार मदिरा को बोतलबंद करने के साथ समाप्त होती है। यद्यपि अधिकांश मदिरा अगूरों से बनायी जाती है, इसे अन्य फलों अथवा विषहीन पौध सामग्रियों से भी तैयार किया जा सकता है। मीड एक प्रकार की वाइन है जिसमें पानी के बाद शहद सबसे प्रमुख घटक होता है।

अंगूर की वाइन.

मदिरा उत्पादन को दो सामान्य श्रेणियों में बाँटा जा सकता है: स्टिल वाइन उत्पादन (कार्बनीकरण के बिना) और स्पार्कलिंग वाइन उत्पादन (कार्बनीकरण के साथ).

मदिरा तथा वाइन उत्पादन के विज्ञान को ओनोलोजी के नाम से जाना जाता है (अमेरिकी अंग्रेजी में, एनोलोजी).

प्रक्रियासंपादित करें

एक अंगूर की संरचना, प्रत्येक दबाव से निकाले गए अंशों को दिखाया गया है।

कटाई के बाद अंगूरों को एक वाइनरी में रखा जाता है और इन्हें शुरुआती फरमेंट (किण्वन) के लिए तैयार किया जाता है, इस स्तर पर रेड वाइन बनाने की प्रक्रिया व्हाइट वाइन से अलग हो जाती है।

रेड वाइन लाल या काले अंगूर के मस्ट (पल्प-गूदे) से बनाया जाता है जिसे अंगूर के छिलके के साथ फर्मेंटेशन (किण्वन) के लिए भेजा जाता है। व्हाइट वाइन को फर्मेंटिंग जूस से तैयार किया जाता है जिसके लिए पिसे हुए अंगूरों को दबाकर उनका रस निकाल लिया जाता है; छिलकों को हटा दिया जाता है और उनका अन्य कोई इस्तेमाल नहीं होता है। कभी-कभी व्हाइट वाइन को लाल अंगूर से बनाया जाता है, इसके लिए अंगूर के छिलकों की कम से कम मात्रा के साथ इनका रस निकाल लिया जाता है। रोज़ वाइन को लाल अंगूरों से तैयार किया जाता है जहाँ रस को गहरे रंग के छिलकों के संपर्क में केवल उतनी देर के लिए रखा जाता है ताकि वह उसके गुलाबी रंग को तो ग्रहण कर सके लेकिन छिलकों में पाए जाने वाले टैनिन से बचा रहे.

प्राथमिक फर्मेंटेशन (किण्वन) की प्रक्रिया शुरू करने के लिए यीस्ट (खमीर) को रेड वाइन के लिए मस्ट (पल्प) या व्हाइट वाइन के लिए जूस में मिलाया जाता है। इस फर्मेंटेशन के दौरान, जिसमें अक्सर एक और दो सप्ताह के बीच का समय लगता है, खमीर अंगूर के रस में मौजूद अधिकाँश शर्करा को इथेनॉल (अल्कोहल) और कार्बन डाइऑक्साइड में बदल देता है। कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में मिल जाता है। लाल अंगूरों के प्राथमिक किण्वन के बाद मुक्त रूप से प्रवाहित हो रही वाइन को पंप के जरिये टैंकों में डाला जाता है और बचे हुए रस और वाइन को निकालने के लिए छिलकों को दबाया जाता है, दबाकर निकाली गयी गयी वाइन को वाइन निर्माताओं की इच्छानुसार मुक्त रूप से प्रवाहित वाइन के साथ मिला दिया जाता है। वाइन को गर्म रखा जाता है और बची हुई शर्करा वाइन और कार्बन डाइऑक्साइड में तब्दील हो जाती है। रेड वाइन तैयार करने में अगली प्रक्रिया सेकंडरी फर्मेंटेशन है। यह एक जीवाणु आधारित फर्मेंटेशन है जो मैलिक एसिड को लैक्टिक एसिड में बदल देती है। यह प्रक्रिया वाइन में एसिड की मात्रा को घटा देती है और वाइन के स्वाद को हल्का कर देती है। कभी-कभी रेड वाइन को परिपक्व होने के लिए कुछ हफ़्तों या महीनों के लिए ओक बैरलों में स्थानांतरित कर दिया जाता है, इस उपाय से ओक की गंध वाइन से अलग हो जाती है। परिष्कृत करने और बॉटलिंग से पहले वाइन को अनिवार्य रूप से व्यवस्थित या स्वच्छ कर इनका समायोजन किया जाना चाहिए.

कटाई से लेकर पीने तक के समय में ब्यूजोलैस नोव्यू वाइन के लिए कुछ समय और उच्च कोटि की वाइन के मामलों में बीस वर्षों से अधिक का अंतर हो सकता है। हालांकि सभी रेड वाइनों में से केवल 10% और व्हाइट वाइनों में से केवल 5% का स्वाद केवल एक वर्ष बाद की तुलना में पाँच वर्षों के बाद कहीं बेहतर होगा.[1] अंगूर की गुणवत्ता और लक्षित वाइन की शैली के आधार पर वाइन निर्माता के किसी विशेष लक्ष्य को पूरा करने के लिए इनमें से कुछ चरणों को जोड़ा या हटाया जा सकता है। तुलनीय गुणवत्ता वाली कई वाइनों का उत्पादन एक जैसी लेकिन उनके उत्पादन से विशेष रूप से अलग नज़रिए के साथ किया जाता है; गुणवत्ता का निर्धारण शुरुआती सामग्री की विशेषताओं के आधार पर किया जाता है और विनिफिकेशन के दौरान अनिवार्य रूप से उठाये गए कदमों के आधार पर नहीं किया जाता है।[2]

उपरोक्त प्रक्रिया में विविधताएं देखी जाती हैं। बुलबुलेदार वाइनों जैसे कि शैम्पेन के मामले में बोतल के अंदर एक अतिरिक्त फर्मेंटेशन की क्रिया होती है जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड की ट्रैपिंग की जाती है और विशेष प्रकार के बुलबुले बनाए जाते हैं। स्वीट वाइन (मीठी वाइन) यह सुनिश्चित करते हुए तैयार की जाती है कि फर्मेंटेशन की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद कुछ अवशिष्ट शर्करा के अवशेष बचे रह गए हैं। इसको कटाई के समय में विलंब करके (लेट हार्वेस्ट वाइन), शर्करा को सांद्रित करने के लिए अंगूरों को शीतलित करके (आइस वाइन) या फर्मेंटेशन की प्रक्रिया पूरी होने से पहले बची हुई खमीर को समाप्त के लिए कोइ चीज मिलाकर किया जा सकता है; उदाहरण के लिए, पोर्ट वाइन तैयार करते समय इसमें हाई प्रूफ ब्रांडी मिलायी जाती है। अन्य मामलों में वाइन निर्माता मीठे अंगूर के रस का कुछ हिस्सा बचाकर रखने का विकल्प चुन सकते हैं और फर्मेंटेशन की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद इसे वाइन में मिला सकते हैं, इस तकनीक को ससरिजर्व (süssreserve) के रूप में जाना जाता है।

इस प्रक्रिया में अपशिष्ट जल, पोमैस और तलछट उत्पन्न होता है जिसके लिए इनके संग्रहण, उपचार और निपटान या लाभप्रद उपयोग की आवश्यकता होती है।

अंगूरसंपादित करें

काबेर्नेट सौविग्न अंगूरों का टुकड़ा.

अंगूर की गुणवत्ता किसी भी अन्य पहलू से कहीं अधिक वाइन की गुणवत्ता को निर्धारित करता है। अंगूर की गुणवत्ता इसके प्रकार के साथ-साथ पौधों के बढ़ने के क्रम में मौसम की स्थिति, मिट्टी के खनिजों और इसकी अम्लता, फसल के समय और छँटाई के तरीके से प्रभावित होती है। इन प्रभावों को संयुक्त रूप से अक्सर अंगूरों का टेरॉयर कहकर संदर्भित किया जाता है।

अंगूर के बागों से अंगूर की फसल आम तौर पर उत्तरी गोलार्द्ध में सितंबर के आरंभ से लेकर नवंबर की शुरुआत तक या दक्षिणी गोलार्द्ध में फरवरी के मध्य से लेकर मार्च की शुरुआत तक प्राप्त की जाती है।[2] दक्षिणी गोलार्द्ध में कुछ ठंढे क्षेत्रों जैसे कि तस्मानिया, ऑस्ट्रेलिया आदि में मई के महीने तक फसल प्राप्त की जाती है।

वाइन बनाने वाले अंगूर की सबसे आम प्रजाति है विटिस विनिफेरा जिसमें यूरोपीय मूल की तकरीबन सभी किस्में शामिल हैं।[2]

हार्वेस्टिंग और डीस्टेमिंगसंपादित करें

इन्हें भी देखें: Ripeness in viticulture

हार्वेस्ट (फसल कटाई) का मतलब है अंगूरों को पौधों से तोड़ना और कई मायनों में यह वाइन उत्पादन का पहला चरण है। अंगूरों को यांत्रिक तरीके से या फिर हाथ से तोड़ा जाता है। अंगूर की फसल प्राप्त करने का निर्णय आम तौर पर वाइन निर्माताओं द्वारा लिया जाता है और इसके लिए शर्करा के स्तर (°ब्रिक्स), एसिड (टारटेरिक एसिड के समकक्षों द्वारा बताये गए अनुसार टीए या टाइट्रेटेबल एसिडिटी) और अंगूर के पीएच (pH) की जानकारी प्राप्त की जाती है। अन्य विचारणीय पहलुओं में शामिल हैं फिनोलोजिकल परिपक्वता, बेरी फ्लेवर, टनीन विकास (बीज का रंग और स्वाद). अंगूर की बेल और मौसम के पूर्वानुमान के की समस्त स्वभाव को ध्यान में रखा जाता है।

कॉर्कस्क्रू आकार का फ़ीड औगर, एक यांत्रिक क्रशर/डीस्टेमर के शीर्ष पर.अंगूर के गुच्छों को उसके बाद मशीन में डाला जाता है जहां पहले तो उन्हें दबाया जाता है उसके बाद तने हटाये जाते हैं। तने अंत में निकलते हैं जबकि रस, छिलके, बीज और कुछ अन्य पदार्थ नीचे से बाहर आते हैं।

यांत्रिक हार्वेस्टर बड़े ट्रैक्टर होते हैं जिन्हें अंगूर की बेलों की जाफरियों के सामने खड़ा कर दिया जाता है और फिर मजबूत प्लास्टिक या रबर की छड़ का उपयोग कर अंगूर की बेल के फल लगे क्षेत्रों में चोट करते हैं जिससे कि अंगूर रेकिस से अलग हो जाते हैं। यांत्रिक हार्वेस्टर की यह विशेषता होती है कि ये अंगूर के बाग़ के एक बड़े क्षेत्र को अपेक्षाकृत कम समय में कवर करते हैं और हार्वेस्ट किये गए प्रत्येक टन में कामगारों की कम से कम संख्या लगानी पड़ती है। यांत्रिक हार्वेस्टिंग का एक नुकसान यह है कि इस उत्पाद में बाहरी गैर-अंगूर वाली चीजें विशेष रूप से पत्तियों की डालियाँ और पत्तियाँ अंधाधुंध मिलाई जाती हैं, लेकिन साथ ही जाफरी प्रणाली और अंगूर के बेल की कैनोपी के प्रबंधन के आधार पर इसमें खराब अंगूर, केन्स, धातु के मलबे, चट्टानें और और यहाँ तक कि छोटे जानवरों और चिड़ियों के घोंसले शामिल हो सकते हैं। कुछ वाइन निर्माता हार्वेस्ट किये गए फलों में इस तरह की चीजों के मिलने से रोकने के लिए यांत्रिक हार्वेस्टिंग से पहले अंगूर की बेलों से पत्तियों और खुले मलबों को हटा लेते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में फलों को अंधाधुंध तोड़े जाने और अंगूर के रस के ज्यादा ऑक्सीकरण के कारण उच्च कोटि की वाइन तैयार करने के लिए यांत्रिक हार्वेस्टिंग का उपयोग शायद ही कभी किया जाता है। अन्य देशों (जैसे कि ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में) सामान्य श्रमिकों की कमी के कारण आम तौर पर प्रीमियम वाइनग्रेप्स की यांत्रिक हार्वेस्टिंग का उपयोग कहीं अधिक किया जाता है।

एक यांत्रिक डेस्टेममिंग का केंद्रीय घटक. छोटे गोलाकार हिस्सों के ऊपर लगे पैडल तने के बड़े टुकड़ों को हटाने के लिए घूमते हैं। अंगूर तने से तोड़ लिए जाते हैं और छिद्र में गिर जाते हैं। एक छोटी मात्रा में तने के टुकड़ों को अंगूर के साथ रखा जाता है ताकि टैनिन संरचना प्राप्त की जा सके.

मैनुअल हार्वेस्टिंग का मतलब है अंगूर की बेलों से अंगूर के गुच्छों को हाथ से तोड़ना. संयुक्त राज्य अमेरिका में परंपरागत रूप से अंगूरों को तोड़कर 30 पाउंड के बक्से में डाला जाता है और कई मामलों में इन बक्सों को वाइनरी तक ले जाने के लिए आधे टन या दो टन के डिब्बों में रखा जाता है। मैनुअल हार्वेस्टिंग का फ़ायदा यह है कि इसमें जानकार श्रमिकों का इस्तेमाल ना केवल अंगूर के पके हुए गुच्छों को तोड़ने के लिए बल्कि कच्चे गुच्छों या जिन गुच्छों में सड़े हुए अंगूर या अन्य दोषयुकी गुच्छों को छोड़ने के लिए भी किया जाता है। यह वाइन के एक भण्डार या टैंक को निम्न गुणवत्ता के फल से दूषित होने से रोकने के लिए सुरक्षा का पहला प्रभावी उपाय हो सकता है।

डीस्टेमिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें अंगूर के तनों को अंगूरों से अलग किया जाता है। वाइन बनाने के तरीके के आधार पर तैयार होने वाली वाइन में टैनिन के विकास और वनस्पति के जायके को कम करने के उद्देश्य से अंगूर को पिसे जाने से पहले यह प्रक्रिया पूरी की जाती है। जैसा कि कुछ जर्मन ट्रोकेनबीयरेनौस्लीज के साथ किया जाता है, सिंगल बेरी हार्वेस्टिंग में इस चरण को नज़रअंदाज किया जाता है और अंगूरों को एक-एक करके चुना जाता है।

क्रशिंग और प्राथमिक फर्मेंटेशन (किण्वन)संपादित करें

क्रशिंग वह प्रक्रिया है जिसमें बेरियों को अच्छी तरह निचोड़ लिया जाता है और बेरियों के तत्वों को अलग करने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए छिलकों को तोड़ा जाता है। डीस्टेमिंग अंगूर के रेकिस (वह तना जिसमें अंगूर लगे रहते हैं) से अंगूरों को अलग करने की एक प्रक्रिया है। पारंपरिक और छोटे-पैमाने पर वाइन बनाने में हार्वेस्ट किये गए अंगूरों को कभी-कभी नंगे पैरों से रौंद कर या सस्ते छोटे स्तर के क्रशरों का इस्तेमाल कर इनकी पिसाई की जाती है। साथ ही साथ इन्हें डीस्टेम भी किया जा सकता है। हालांकि बड़े वाइनरियों में एक यांत्रिक क्रशर/डीस्टेमर का इस्तेमाल किया जाता है। रेड और व्हाइट वाइन तैयार करने के लिए डीस्टेमिंग का निर्णय अलग-अलग तरीके से लिया जाता है। आम तौर पर व्हाइट वाइन बनाते समय केवल फल की पिसाई की जाती है, इसके बाद तनों को बेरियों के साथ प्रेस में रखा जाता है। मिश्रण में तनों की उपस्थिति रस को पहले निकाले गए छिलकों से होकर प्रवाहित कर दबाव डालने की सुविधा प्रदान करती है। ये प्रेस के किनारे पर जमा हो जाते हैं। रेड वाइन तैयार करने के लिए अंगूरों के तनों को आम तौर पर फर्मेंटेशन से पहले निकाल लिया जाता है क्योंकि तनों में टैनिन तत्व की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा होती है; टैनिन के अलावा ये वाइन को एक वानस्पतिक गंध भी दे सकते हैं (2-मेथॉक्सी-3-आइसोप्रोपाइलपायराजिन के निकलने के कारण, जिसमें हरी बेल मिर्च के जैसी एक गंध होती है।) कई बार जब अंगूरों में स्वयं उम्मीद से कम टैनिन की मात्रा मौजूद होती है तो वाइन निर्माता इन्हें छोड़ देने का निर्णय ले सकते हैं। यह तब और अधिक स्वीकार्य हो जाता है जब तने "पके हुए" होते हैं और भूरे रंग में बदलना शुरू हो जाते हैं। अगर अधिक मात्रा में छिलके निकालने की जरूरत होती है तो वाइन निर्माता डीस्टेमिंग के बाद अंगूरों की पिसाई का विकल्प चुन सकता है। तनों को पहले निकालने का मतलब है तनों के टैनिन को निकाला नहीं जा सकता है। इन मामलों में अंगूरों को दो रोलरों के बीच से गुजारा जाता है जो अंगूरों को इतना निचोड़ लेते हैं कि इनके छिलके और पल्प अलग-अलग हो जाते हैं लेकिन इतना अधिक भी नहीं कि छिलकों के उत्तकों में जरूरत से ज्यादा टूट-फूट या काट-छांट हो जाए. कुछ मामलों में आंशिक कार्बनिक मैसरेशन के जरिये फल जैसी सुगंध को बरकरार रखने को प्रोत्साहित करने के लिए उल्लेखनीय रूप से "नाजुक" रेड वेरियेटल्स जैसे कि पीनॉट नॉयर या साइरा के मामले में अंगूरों के पूरे या कुछ हिस्से को बगैर पिसा हुआ छोड़ दिया जाता है (जिसे "होल बेरी" कहते हैं).

क्रशर से बाहर निकलते हुए कुचले गए अंगूर.

ज्यादातर रेड वाइन अपना रंग अंगूर के छिलकों से प्राप्त करते हैं (इसका अपवाद नॉन-विनिफेरा वाइन्स की किस्में या हैब्रिड्स हैं जिनमें डार्क माल्विदिन 3,5-डाइग्लूकोसाइड एंथोसायनिन के धब्बों के साथ रस मौजूद होते हैं) और इसीलिये रंग को निकालने के लिए रस और छिलके के बीच संपर्क होना आवश्यक है। रेड वाइन अंगूरों की डीस्टेमिंग और क्रशिंग कर एक टैंक में तैयार की जाती है और फर्मेंटेशन (मैसरेशन) की सम्पूर्ण प्रक्रिया के दौरान छिलकों को रस के संपर्क में रहने दिया जाता है। बगैर पिसे हुए फलों पर बहुत तेजी से दबाव डालकर (फास्टिडियस प्रेसिंग) लाल अंगूरों से सफ़ेद (रंगहीन) वाइन को तैयार किया जा सकता है। इससे अंगूर के रस और छिलकों के बीच संपर्क कम हो जाता है (जैसा कि ब्लैंक डी नॉयर्स बुलबुलेदार वाइन बनाने में किया जाता है जिसे एक लाल विनिफेरा अंगूर, पिनॉट नॉयर से तैयार किया जाता है।)

ज्यादातर व्हाइट वाइन डीस्टेमिंग या क्रशिंग के बगैर तैयार किये जाते हैं और इन्हें उठाने वाले डब्बों से सीधे प्रेस में स्थानांतरित कर दिया जाता है। ऐसा छिलकों या अंगूर के बीजों से किसी भी तरह टैनिन को निकलने से बचाने के साथ-साथ खुली हुई बेरियों की बजाय अंगूर के गुच्छों के एक मैट्रिक्स के जरिये रस के समुचित प्रवाह को कायम रखने के लिए किया जाता है। कुछ परिस्थितियों में वाइन निर्माता सफ़ेद अंगूरों को थोड़ी देर के लिए, आम तौर पर तीन से 24 घंटों के लिए छिलकों के संपर्क में पिसाई का विकल्प चुन सकते हैं। इससे छिलकों से जायके और टैनिन को निकालने (बहुत ज्यादा बेंटोनाइट मिलाये बगैर प्रोटीन के अवक्षेपण को प्रोत्साहित करने के लिए टैनिन को निकाल लिया जाता है) के साथ-साथ पोटेशियम आयन को निकालने में मदद मिलती है जो बाइटारटेरेट अवक्षेपण (टार्टर की क्रीम बनने) में भाग लेते हैं। इसके परिणाम स्वरूप जूस का पीएच (pH) भी बढ़ जाता है जो बहुत अधिक अम्लीय अंगूरों के लिए वांछनीय हो सकता है। यह आज की तुलना में 1970 के दशक में एक आम उपाय था, हालांकि अभी भी कैलिफोर्निया में कुछ सॉविग्नोन ब्लॉन्क और चार्दोने उत्पादकों द्वारा इस तरीके को आजमाया जाता है।

रोज़ वाइन्स के मामले में फलों की पिसाई की जाती है और गहरे छिलकों को रस के संपर्क में उतनी देर तक रहने दिया जाता है जब तक कि उतना रंग ना निकल आये जितना कि वाइन निर्माता चाहता है। इसके बाद मस्ट (पल्प) को दबाया जाता है और फर्मेंटेशन की प्रक्रिया इस तरह पूरी की जाती है मानो कि वाइन निर्माता एक व्हाइट वाइन तैयार कर रहा था।

खमीर सामान्य रूप से पहले से ही अंगूरों पर मौजूद रहती है जो अक्सर अंगूरों के बुकनीदार स्वरूप में दिखाई देता है। फर्मेंटेशन की प्रक्रिया इस प्राकृतिक खमीर के साथ पूरी की जा सकती है लेकिन चूंकि बिलकुल सटीक किस्म के मौजूद खमीर के आधार पर यह एक अप्रत्याशित परिणाम दे सकता है इसीलिये मस्ट के साथ अक्सर संवर्धित खमीर को मिलाया जाता है। वाइल्ड फर्मेंट्स के इस्तेमाल में आने वाली एक प्रमुख समस्या है फर्मेंटेशन की सम्पूर्ण प्रक्रिया पूरी होने में विफलता, जिसमिन शर्करा के कुछ अवशेष फर्मेंटेशन के बगैर रह जाते हैं। ऐसे में जब ड्राई वाइन प्राप्त करना होता है तो यह वाइन को मीठा बना सकता है। लगातार वाइल्ड फर्मेंट्स के कारण बाइ प्रोडक्ट के रूप में एक अप्रिय एसिटिक एसिड (विनेगार) उत्पन्न हो सकता है।

फर्मेंटिंग रेड वाइन की सतह पर अंगूर के छिलकों की एक टोपी सी बन जाती है।

प्राथमिक किण्वन के दौरान खमीर की कोशिकाएं मस्ट (पल्प) में मौजूद शर्करा पर पलती हैं और इसी कारण कार्बन डाइऑक्साइड गैस और अल्कोहल का उत्पादन कई गुणा बढ़ जाता है। किण्वन के दौरान तापमान का स्तर अंतिम उत्पाद के स्वाद के साथ-साथ किण्वन की गति दोनों को प्रभावित करता है। रेड वाइन के लिए तापमान आम तौर पर 22 से 25 डिग्री सेल्सियस तक और व्हाइट वाइन के लिए 15 से 18 डिग्री सेल्सियस तक होता है।[2] रूपांतरित किये गए प्रत्येक ग्राम शर्करा के लिए अल्कोहल की आधा ग्राम मात्रा तैयार होती है, इसीलिये 12% की अल्कोहल सांद्रता प्राप्त करने के लिए मस्ट में लगभग 24% शर्करा की मात्रा मौजूद होनी चाहिए. मस्ट में शर्करा की प्रतिशत मात्रा की गणना मापे गए घनत्व, मस्ट के वजन और एक विशिष्ट प्रकार के हाइड्रोमीटर की मदद से की जाती है जिसे सैकारोमीटर कहते हैं। अगर अंगूरों में शर्करा की मात्रा बहुत ही कम होती है जिससे कि अल्कोहल की वांछित प्रतिशत मात्रा प्राप्त नहीं हो पाती है तो ऐसे में चीनी मिलाई जा सकती है (चैप्टलाइजेशन). व्यावसायिक तौर पर वाइन तैयार करने में चैप्टलाइजेशन स्थानीय विनियमों के अधीन है।

अल्कोहलिक फर्मेंटेशन के दौरान या बाद में मेलोलैक्टिक फर्मेंटेशन की प्रक्रिया भी पूरी की जाती है जिसके दौरान बैक्टेरिया के विशिष्ट स्ट्रेंस मैलिक एसिड को अपेक्षाकृत हल्के लैक्टिक एसिड में बदल देते हैं। इस प्रकार का फर्मेंटेशन अक्सर वांछित बैक्टीरिया के टीकों द्वारा शुरू किया जाता है।

प्रेसिंगसंपादित करें

मिडगल हाएमेक में एक प्राचीन वाइनप्रेस, जिसका प्रेस करने वाला हिस्सा मध्य में है और एकत्रण करने वाला हिस्सा निचले बाएं सिरे पर है।

प्रेसिंग अंगूरों या अंगूर के छिलकों से रस या वाइन अलग करने के क्रम में अंगूरों या पोमैस पर दबाव डालने की एक प्रक्रिया है। वाइन बनाने में प्रेसिंग हमेशा एक आवश्यक कार्य नहीं होता है, जब अंगूरों की पिसाई होती है तो रस एक पर्याप्त मात्रा में तुरंत अलग हो जाता है (जिसे फ्री-रन जूस कहते हैं) जिसे विनिफिकेशन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। आम तौर पर यह फ्री-रन जूस दबाकर निकाले गए रस की तुलना में उन्नत कोटि का होता है। हालांकि ज्यादातर वाइनरियाँ अपने (गैलन) प्रति टन उत्पादन को बढाने के लिए प्रेसों का उपयोग करती हैं क्योंकि प्रेस से निकाला गया रस अंगूर से निकाले गए रस की कुल मात्रा के 15%-30% का प्रतिनिधित्व कर सकता है।

प्रेस की कार्यप्रणाली में अंगूर के छिलकों या साबुत अंगूर के गुच्छों को एक कठोर स्थिर सतह और एक गतिशील सतह के बीच रखा जाता है और दोनों सतहों के बीच आयतन धीरे-धीरे कम होता जाता है। आधुनिक प्रेस प्रत्येक चक्र प्रेस पर लगाने वाले समय और दबाव को निर्धारित करते हैं जो आम तौर पर 0 बार से 2.0 के बीच नियंत्रित रहती है। कभी-कभी वाइन निर्माता ऐसे दबाव को चुनते हैं जो प्रेस किये गए रस के प्रवाह को अलग कर देता है जिसे "प्रेस कट" तैयार करना कहते है। चूंकि दबाव छिलकों से निकले टैनिन की मात्रा को बढ़ा देता है जिससे रस में इसकी मात्रा बढ़ जाती है, इसीलिये प्रेस किया गया रस अक्सर बहुत अधिक टैनिक या कड़क हो जाता है। बेरी में अंगूर के रस के तत्वों की स्थिति के कारण (पानी और अम्ल मुख्य रूप से मिजोकार्प या पल्प में पाया जाता है, जबकि टैनिन मुख्यतः पेरिकार्प या छिलकों या बीजों में मौजूद होते हैं) प्रेस किये गए रस या वाइन में अम्ल की मात्रा कम हो जाती है और फ्री-रन जूस की तुलना में इसका पीएच (pH) मान ज्यादा होता है।

आधुनिक तरीके से वाइन उत्पादन की शुरुआत से पहले ज्यादातर प्रेस लकड़ी से बने बास्केट प्रेस होते थे और इन्हें हाथों से संचालित किया जाता था। बास्केट प्रेस एक निर्धारित प्लेट के ऊपर लकड़ी के स्लैट्स के एक सिलेंडर से बने होते हैं जिसमें एक चलायमान प्लेट होता है जिसे नीचे की ओर धकेला जा सकता है (आम तौर पर एक सेन्ट्रल रैचेटिंग थ्रेडेड स्क्रू द्वारा). प्रेस संचालक अंगूरों या पोमैस को लकड़ी के सिलेंडर में भर देता है, ऊपरी प्लेट को अपनी जगह पर रख देता है और इसे तब तक नीचे किये रहता है जब तक की रस लकड़ी के स्लैट्स से प्रवाहित नहीं होने लगता है। जब रस का प्रवाह कम हो जाता है तो प्लेट को एक बाद फिर रेचेट कर नीचे लाया जाता है। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है जब तक कि प्रेस संचालक यह नहीं तय कर लेता है कि प्रेस किये गए रस या वाइन की गुणवता मानक स्तर से कम हो गयी है या समूचा रस दबाकर निकाल लिया गया है। 1990 के दशक की शुरुआत से ऐतिहासिक बास्केट प्रेसों की अच्छी तरह प्रेसिंग को दोहराने की चाह में उच्चस्तरीय-अंतिम उत्पादकों के जरिये आधुनिक यांत्रिक बास्केट प्रेसों को पुनर्जीवित किया गया है। क्योंकि बास्केट प्रेस एक अपेक्षाकृत कॉम्पैक्ट डिजाइन के होते हैं, प्रेस केक रस के प्रेस से निकलने से पहले प्रवाहित होने के लिए एक अपेक्षाकृत लंबा मार्ग प्रदान करता है। बास्केट प्रेस की वकालत करने वालों का यह मानना है कि अंगूर या पोमैस केक से होकर गुजरने वाला यह अपेक्षाकृत लंबा मार्ग उन ठोस पदार्थों के लिए एक फ़िल्टर के रूप में कार्य करता है जो अन्यथा प्रेस जूस की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।

वर्ल्ड हेरिटेज वाइनयार्ड्स के सामने लकड़ी की एक प्राचीन वाइन प्रेस.

रेड वाइन के मामले में प्राथमिक किण्वन के बाद मस्त को प्रेस किया जाता है जो घोल में से छिलकों या अन्य ठोस पदार्थों को अलग कर देता है। व्हाइट वाइन की स्थिति में घोल को किण्वन से पहले मस्ट से अलग कर लिया जाता है। रोज़ वाइन के मामले में वाइन को रंग देने के लिए छिलकों को एक छोटी अवधि के लिए इसके संपर्क में रहने दिया जाता है, ऐसी स्थिति में मस्ट को भी प्रेस किया जा सकता है। वाइन को कुछ समय तक रखने या पुराना होने देने के बाद, वाइन को मृत खमीर और बचे हुए किसी भी ठोस पदार्थ (जिसे लीस कहते हैं) से अलग कर लिया जाता है और इसे एक नए कंटेनर में स्थानांतरित कर दिया जाता है जहाँ फर्मेंटेशन की अतिरिक्त प्रक्रियाओं को पूरा किया जा सके.

पिजियेजसंपादित करें

पिजियेज खुले किण्वन टैंकों में अंगूरों की परंपरागत स्टोम्पिंग के लिए वाइन उत्पादन का एक फ्रांसीसी शब्द है। कुछ विशेष प्रकार का वाइन तैयार करने के लिए अंगूरों को एक क्रशर में डालकर चलाया जाता है और उसके बाद इस रस को खुले किण्वन टैंकों में निकाल लिया जाता है। किण्वन शुरू हो जाने के बाद अंगूर के छिलकों को किण्वन की प्रक्रिया में निकले कार्बन डाइऑक्साइड गैसों द्वारा सतह की ओर धकेल दिया जाता है। छिलकों और अन्य ठोस पदार्थों की इस परत को कैप के रूप में जाना जाता है। चूंकि छिलके टैनिन्स के स्रोत होते हैं, कैप को प्रतिदिन घोल में मिश्रित किया जाता है या पारंपरिक रूप से वैट के माध्यम से स्टोम्पिंग द्वारा "पंच" किया जाता है।

शीत और ताप स्थिरीकरणसंपादित करें

इन्हें भी देखें: Clarification and stabilization of wine

शीत स्थिरीकरण (कोल्ड स्टेबिलाइजेशन) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका उपयोग वाइन बनाते समय वाइन से टारट्रेट क्रिस्टलों (सामान्यतः पोटेशियम बाइटारट्रेट) को कम करने में किया जाता है। ये टारट्रेट क्रिस्टल रेत के साफ़ कणों जैसे दिखाई देते हैं और इन्हें "वाइन क्रिस्टल" या वाइन "डायमंड" के नाम से भी जाना जाता है। इनका निर्माण टारटेरिक अम्ल और पोटेशियम पोटेशियम के संयोग से होता है और ये वाइन में तलछट के रूप में दिखाई देते हैं हालांकि ये तलछट नहीं होते हैं। किण्वन के बाद शीत स्थिरीकरण प्रक्रिया के दौरान वाइन के तापमान को 1-2 सप्ताह तक हिमांक बिंदु (फ्रीजिंग) तक गिरा दिया जाता है। इससे क्रिस्टल वाइन से अलग हो जाते हैं और पात्र (होल्डिंग वेसेल) के किनारों से चिपक जाते हैं। जब वाइन पात्र से निकाली जाती है टारट्रेट पात्र में ही रह जाते हैं। इनका निर्माण उन वाइन की बोतलों में भी हो सकता है जिनका भंडारण अत्यंत ठंडी परिस्थितियों में किया गया हो.

"ताप स्थिरीकरण" के दौरान अस्थिर प्रोटीनों को बेंटोनाइट में अवशोषित करके अलग पृथक कर लिया जाता है, इस तरह उन्हें बोतलबंद वाइन में अवक्षेपित होने से बचाया जाता है।[2]

द्वितीयक किण्वन और समूह परिपक्वन (सेकंडरी फर्मेंटेशन और बल्क एजिंग)संपादित करें

थ्री कौइर्स विनयार्ड, ग्लूस्टरशायर, इंग्लैंड में स्टेनलेस स्टील फर्मेंटेशन वेसेल तथा नए ओक बैरल

द्वितीयक किण्वन और परिपक्वन प्रक्रिया के दौरान, जिसमें तीन से छः महीने लगते हैं, किण्वन की प्रक्रिया बहुत धीरे-धीरे जारी रहती है। वाइन को ऑक्सीकरण से बचाने के लिए वाइन एक वायुरोधक (एयरलॉक) में रखी जाती है। अंगूरों के प्रोटीनों का विखंडन होता है और शेष खमीर कोशिकाओं एवं दूसरे महीन कणों को तलछट में बैठने दिया जाता है। पोटेशियम बाइटारट्रेट भी तलछट में बैठ जाएगा, बोतलबंद करने के बाद (हानिरहित) टारट्रेट क्रिस्टलों को प्रकट होने से बचाने के लिए प्रक्रिया को शीत स्थिरीकरण के ज़रिये और बढ़ाया जा सकता है। इन प्रक्रियाओं का परिणाम यह होता है कि धुंधली वाइन साफ़ दिखने लगती है। मैल को हटाने के लिए इस प्रक्रिया के दौरान वाइन को निचोड़ा भी जा सकता है।

द्वितीयक किण्वन आम तौर पर या तो कई घन मीटर आयतन वाले जंगरोधी स्टील के बर्तनों में या ओक के बैरलों में होता है, यह वाइन उत्पादक के उद्देश्यों पर निर्भर करता है। ओक रहित वाइन को स्टेनलेस स्टील या दूसरे ऐसे पदार्थ के बैरलों में किण्वित किया जाता है जिनका वाइन के अंतिम स्वाद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. इच्छित स्वाद के अनुसार इसे स्टेनलेस स्टील में किण्वित करके थोड़े समय के लिए ओक में रखा जा सकता है या फिर पूरा किण्वन स्टेनलेस स्टील के बर्तन में ही किया जा सकता है। पूरी तरह से लकड़ी के बैरलों की बजाय ग़ैर-लकड़ी के बैरल में ओक की चिप्पियों को मिलाया जा सकता है। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से सस्ती वाइन में इस्तेमाल की जाती है

शौकिया वाइन बनाने वाले अक्सर वाइन उत्पादन के लिए शीशे की बड़ी बोतलों (कारबॉयज) का इस्तेमाल करते हैं; इन बोतलों (जिन्हें कभी-कभी डेमीजॉन्स कहा जाता है) की क्षमता 4.5 से 54 लीटर (1.2-14.3 अमेरीकी गैलन) तक होती है। इस्तेमाल किये जाने वाले पात्र का प्रकार, बनाई जाने वाली वाइन की मात्रा, इस्तेमाल किये जाने वाले अंगूरों और वाइन निर्माता के इरादों पर निर्भर करता है।

मेलोलैक्टिक किण्वनसंपादित करें

मेलोलैक्टिक किण्वन तब होता है जब लैक्टिक अम्ल के जीवाणु मैलिक अम्ल को उपापचय (मेटाबोलाइज) कर लैक्टिक अम्ल और कार्बन डाईआक्साइड बनाते हैं। यह क्रिया या तो स्वेच्छा से पूरी की जाती है जिसमें विशेष रूप से संवर्धित किये गए जीवाणुओं की प्रजाति को परिपक्व हो रही वाइन में मिलाया जाता है या फिर यह क्रिया संयोगवश भी हो सकती है अगर असंवर्धित लैक्टिक अम्ल के जीवाणु पहले से ही मौजूद हों.

मेलोलैक्टिक किण्वन उस वाइन के स्वाद को बेहतर बना सकता है जिसमें मैलिक अम्ल का स्तर अधिक हो क्योंकि मैलिक अम्ल की अधिक सांद्रता आम तौर पर अरुचिकर और तीखे स्वाद के एहसास की वजह बनती है, जबकि लैक्टिक अम्ल अधिक हल्का और कम तीखा माना जाता है।

यह प्रक्रिया अधिकतर रेड वाइन में इस्तेमाल की जाती है जबकि व्हाइट वाइन में यह विवेकाधीन होती है।

प्रयोगशाला संबंधी परीक्षणसंपादित करें

वाइन चाहे टैंकों में परिपक्व हो रही हो या बैरलों में, वाइन की स्थिति जानने के लिए समय-समय पर प्रयोगशाला मे परीक्षण किये जाते हैं। सामान्य परीक्षणों में °ब्रिक्स, पीएच (pH), टाइट्रेटेबल एसिडिटी, अवशिष्ट शर्करा, मुक्त या उपलब्ध सल्फर, कुल सल्फर, वाष्पीय अम्लता और अल्कोहल प्रतिशत शामिल हैं। अतिरिक्त परीक्षणों में टार्टर के क्रीम का क्रिस्टलीकरण (पोटेशियम हाईड्रोजन टारट्रेट) और ताप अस्थिर प्रोटीन का अवक्षेपण शामिल है, यह अंतिम परीक्षण केवल व्हाइट वाइनों तक ही सीमित है। ये परीक्षण अक्सर वाइन बनाने की पूरी अवधि में और बोतलीकरण से पहले भी संपादित किये जाते हैं। इन परीक्षणों के परिणामों की प्रतिक्रिया में तब वाइन निर्माता सही उपचार प्रक्रिया के बारे में निर्णय ले सकता है, उदाहरण के लिए अधिक मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड को मिलाना. संवेदी परीक्षण भी किये जाते हैं और फिर इनके आधार पर वाइन निर्माता उपचारात्मक कदम उठा सकता है जैसे की वाइन के स्वाद को नरम करने के लिए प्रोटीन मिलाना.

ब्रिक्स अंगूर के रस में ठोस घुलनशील का एक मापक है और यह केवल शर्करा का ही नहीं बल्कि कई दूसरे घुलनशील पदार्थों का भी प्रतिनिधित्त्व करता है, जैसे कि लवण, अम्ल और टैनिन, जिन्हें कभी-कभी पूर्ण घुलनशील ठोस (टीएसएस) कहा जाता है। हालांकि शर्करा सबसे ज्यादा मात्र में उपस्थित रहने वाला यौगिक है और इसलिए सारे व्यवहारिक उद्देश्यों से ये इकाइयां शर्करा स्तर का एक मापन हैं। अंगूरों में शर्करा का स्तर केवल इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि यह वाइन में अंतिम रूप से अल्कोहल के अंश का निर्धारण करता है बल्कि इसलिए भी कि यह अंगूरों की परिपक्वता का अप्रत्यक्ष सूचकांक है। ब्रिक्स (संक्षेप में बीएक्स (Bx)) घोल के ग्राम के प्रति 100 ग्राम में मापा जाता है, इसलिए 20 Bx का मतलब है कि 100 ग्राम रस में 20 ग्राम घुलनशील यौगिक मौजूद हैं। अंगूरों में शर्करा की मात्रा के दूसरे सामान्य मापक भी हैं, स्पेसिफिक ग्रेविटी (विशिष्ट घनत्व), ईशले (जर्मनी) और ब्यूम (फ़्रांस). फ्रांसीसी ब्यूम (संक्षेप में Be° या Bé°) में यह लाभ है कि एक Bé° लगभग एक प्रतिशत अल्कोहल का मान देता है। साथ ही एक Be° 1.8 ब्रिक्स के बराबर होता है यानी प्रति सौ ग्राम में 1.8 ग्राम शर्करा. इससे यह निर्णय लेने में मदद मिलती है कि अगर रस में शर्करा कम है तो एक प्रतिशत अल्कोहल पाने के लिए प्रति 100 मि.ली. में 1.8 ग्राम मिलाया जाए या 18 ग्राम प्रति लीटर. इस प्रक्रिया को चेप्टलाइजेशन कहा जाता है और यह कई देशों में अवैध है (लेकिन घरेलू वाइन उत्पादकों के लिए पूर्णतः स्वीकार्य है). आम तौर पर ड्राई टेबल वाइन बनाने के लिए 20 से 25 के बीच Bx वांछनीय है (11 से 14 Be° के समतुल्य).

शर्करा की मात्रा को देखने के लिए तुरंत संकेत अंक हासिल करने के क्रम में ब्रिक्स परीक्षण या तो प्रयोगशाला में या खेतों में ही किया जा सकता है। ब्रिक्स को आम तौर पर रेफ्रेक्टोमीटर से मापा जाता है जबकि दूसरी विधियाँ हाईड्रोमीटर का प्रयोग करती हैं। सामान्यतः हाईड्रोमीटर एक सस्ता विकल्प है। शर्करा के अधिक शुद्ध मापन के लिए लिए यह याद रखना ज़रूरी है कि सभी मापन उस तापमान से प्रभावित होते हैं जिस तापमान पर रीडिंग ली गयी है। उपकरणों के आपूर्तिकर्ता आम तौर पर संशोधन चार्ट उपलब्ध करवाते हैं।

वाष्पशील अम्लता परीक्षण वाइन में वाष्प द्वारा आसवित होने वाले अम्ल की किसी तरह की उपस्थिति को सुनिश्चित करता है। एसिटिक एसिड मुख्य रूप से मौजूद होता है लेकिन लैक्टिक, ब्यूटिरिक, प्रोपियोनिक और फॉर्मिक एसिड भी पाए जा सकते हैं। आम तौर पर यह परीक्षण इन अम्लों की जाँच एक कैश स्टील में करता है लेकिन एचपीसीएल, गैस क्रोमैटोग्राफी और एंजाइमेटिक विधि जैसे नए तरीके उपलब्ध हैं। अंगूरों में पायी जाने वाली वाष्पशील अम्लता की मात्रा नगण्य होती है क्योंकि यह सूक्ष्मजीवों के उपापचय का एक बाइ-प्रोडक्ट होता है। यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि एसिटिक एसिड जीवाणु को विकसित होने के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। वाइन के कंटेनरों में से हवा को पूरी तरह निकाल लेने के अलावा सल्फर डाइऑक्साइड मिलाने से जीवाणुओं के विकसित होने की गति नियंत्रित हो जाती है। खराब अंगूरों को निकाल देने से भी एसिटिक एसिड जीवाणु से संबंधित समस्याओं से बचा जा सकता है। सल्फर डाइऑक्साइड के प्रयोग और कम वाष्प अम्ल (वी.ए.) उत्पादित करने वाले सैकारोमाइसेज के अंश को मिलाने से एसिटिक एसिड उत्पादन करने वाली खमीर प्रभावित हो सकती है। वाइन से अस्थिर अम्लता को हटाने के लिए एक अपेक्षाकृत नया तरीका रिवर्स ऑस्मोसिस है। सम्मिश्रण (ब्लेंडिंग) से भी मदद मिल सकती है - उच्च वाष्पशील अम्लता (वी.ए.) वाली वाइन को छानकर (जिम्मेदार सूक्ष्म जीवों को हटाने के लिए) कम वाष्पशील अम्लता (वी.ए.) वाली वाइन में मिलाया जा सकता है ताकि एसिटिक एसिड का स्तर संवेदी सीमा से नीचे रहे.

ब्लेंडिंग और फाइनिंग (मिश्रण और शोधन)संपादित करें

वांछित स्वाद प्राप्त करने के क्रम में बॉटलिंग से पहले विभिन्न बैचों के वाइन को मिश्रित किया जा सकता है। वाइन निर्माता विभिन्न परिस्थितियों में तैयार किए गए विभिन्न अंगूरों और बैचों के वाइनों को मिश्रित कर कथित कमियों को दूर कर सकता है। इस तरह के समायोजन अम्ल या टैनिन के स्तरों के समायोजन की तरह अत्यंत सरल और एक सुसंगत स्वाद प्राप्त करने के लिए विभिन्न किस्मों या विंटेजेज की ब्लेंडिंग की तरह अत्यंत जटिल भी हो सकते हैं।

वाइन उत्पादन के दौरान टैनिन्स को हटाने, कसैलापन को दूर करने और उन सूक्ष्मदर्शी कणों को निकालने के लिए जो वाइन को खराब कर सकते हैं, फाइनिंग एजेंट्स का इस्तेमाल किया जाता है। कौन सा फाइनिंग एजेंट इस्तेमाल किया जाना है यह वाइन निर्माता द्वारा तय किया जाता है और इसमें अलग-अलग उत्पाद के अनुसार और यहाँ तक कि अलग-अलग बैच के अनुसार अंतर हो सकता है (आम तौर पर यह उस विशेष वर्ष के अंगूरों पर निर्भर करता है).[3]

वाइन उत्पादन में जिलेटिन का उपयोग सदियों से किया जा रहा है और इसे वाइन के शोधन या शुद्धिकरण के लिए एक पारंपरिक विधि के रूप में मान्यता दी जाती है। यह टैनिन तत्व को कम करने के लिए भी आम तौर पर सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला एजेंट है। सामान्यतः वाइन में कोई भी जिलेटिन बचा नहीं रह जाता है क्योंकि यह वाइन के तत्वों के साथ प्रतिक्रया करता है, क्योंकि शुद्धिकरण के बाद यह एक तलछट बनाता है जिसे बॉटलिंग से पहले छानकर निकाल दिया जाता है।

जिलेटिन के अलावा वाइन के लिए अन्य फाइनिंग एजेंटों को अक्सर जानवरों या मछलियों के उत्पादों से तैयार किया जाता है जैसे कि माइक्रोनाइज्ड पोटैशियम कैसिनेट (कैसिन दूध का प्रोटीन है), अण्डों के सफ़ेद भाग, हड्डियों की राख, बैल का रक्त, इसिंग्लास (स्ट्रजन ब्लैडर), पीवीपीपी (एक कृत्रिम यौगिक), लाइसोजाइम और स्किम मिल्क पाउडर.[3]

कुछ सुगंधि युक्त वाइनों में शहद या अंडे के यॉक से निकाले गए तत्व मौजूद होते हैं।[3]

गैर-पशु-आधारित फिल्टरिंग एजेंटों को भी अक्सर इस्तेमाल किया जाता है जैसे कि बेंटोनाइट (एक ज्वालामुखी संबंधी मिट्टी से बना फिल्टर), डायएटमेशियस अर्थ, सेलूलोज़ पैड, कागज के फिल्टर और झिल्लीदार फिल्टर (सामान आकार की छिद्रों वाली प्लास्टिक पॉलीमर सामग्री की पतली फिल्में).

परिरक्षक (प्रेजरवेटिव्स)संपादित करें

वाइन बनाने में इस्तेमाल होने वाले सबसे आम परिरक्षक है सल्फर डाइऑक्साइड जिसे सोडियम या पोटेशियम मेटाबाइसल्फेट मिलाकर प्राप्त किया जाता है। एक अन्य उपयोगी परिरक्षक पोटेशियम सोर्बेट है।

सल्फर डाइऑक्साइड के दो प्रमुख कार्य हैं, पहला यह एक सूक्ष्मजीव रोधी एजेंट है और दूसरा यह एक ऑक्सीकरण रोधी है। व्हाइट वाइन तैयार करने में इसे किण्वन से पहले और अल्कोहलिक किण्वन की प्रक्रिया पूरी होने के तुरंत बाद मिलाया जा सकता है। अगर इसे अल्कोहलिक फारमेंट के बाद मिलाया जाता है तो यह मेलोलैक्टिक फर्मेंटेशन, बैक्टीरिया को होने वाले नुक़सान से बचा सकता है या इसे रोक सकता है और ऑक्सीजन के हानिकारक प्रभावों के खिलाफ सुरक्षा में मदद कर सकता है। 100 मिलीग्राम प्रति लीटर (सल्फर डाइआक्साइड के) तक मिलाया जा सकता है लेकिन उपलब्ध या स्वतंत्र सल्फर डाइआक्साइड को भी एस्पिरेशन विधि से मापा जाना चाहिए और इसे 30 मिलीग्राम प्रति लीटर पर समायोजित किया जाना चाहिए. उपलब्ध सल्फर डाइआक्साइड को बॉटलिंग के समय तक इस स्तर पर बनाए रखा जाना चाहिए. रोज़ वाइन्स के लिए इसे कम मात्रा में मिलाया जा सकता है और उपलब्धता स्तर 30 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक नहीं होना चाहिए.

रेड वाइन तैयार करने में रंग को स्थिर होने देने के लिए फारमेंट से पहले सल्फर डाइऑक्साइड को उच्च स्तरों (100 मिलीग्राम प्रति लीटर) पर इस्तेमाल किया जा सकता है अन्यथा इसे मेलोलैक्टिक फारमेंट की समाप्ति पर उपयोग किया जाता है और यह उसी तरह कार्य करता है जैसा कि व्हाइट वाइन में करता है। हालांकि लाल धब्बों की ब्लीचिंग को रोकने के लिए कम मात्रा में (20 मिलीग्राम प्रति लीटर मान लें) इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए और कायम रहने वाला स्तर तकरीबन 20 मिलीग्राम प्रति लीटर होना चाहिए. इसके अलावा हल्के ऑक्सीकरण को दूर करने और एसिटिक एसिड जीवाणु के विकास को रोकने के लिए अल्कोहलिक फर्मेंट के बाद और मैलोलैक्टिक फर्मेंट से पहले रेड वाइन में इसकी छोटी मात्राएं (मानो कि 20 मिलीग्राम प्रति लीटर) मिलाई जा सकती हैं।

सल्फर डाइऑक्साइड के उपयोग के बिना वाइन्स में आसानी से जीवाणुओं के नष्ट होने की समस्या उत्पन्न हो सकती है, भले ही वाइन तैयार करने का तरीका कितना ही स्वच्छ क्यों ना हो.

पोटेशियम सोर्बेट, विशेष रूप से बोतलों में बंद मीठी वाइनों के लिए खमीर सहित कवक के विकास को नियंत्रित करने में प्रभावी होता है। हालांकि एक संभावित खतरा सोर्बेट के मेटाबोलिज्म से एक पोटेंट के जेरानियोल का है और यह बहुत ही अप्रिय उपोत्पाद (बाइ-प्रोडक्ट) है। इससे बचने के लिए या तो वाइन को स्टेराइल कर बोतलबंद किया जाना चाहिए या फिर इसमें इतना सल्फर डाइऑक्साइड होना चाहिए कि यह जीवाणु के विकास को रोक सके. स्टेराइल बॉटलिंग में फिल्टरेशन का उपयोग भी शामिल है।

फिल्टरेशनसंपादित करें

वाइन बनाने में फिल्टरेशन का इस्तेमाल दो उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है, शुद्धिकरण और सूक्ष्मजीव स्थिरीकरण. शुद्धिकरण में वाइन के प्रत्यक्ष स्वरुप को प्रभावित करने वाले बड़े कणों को हटा लिया जाता है। सूक्ष्मजीव स्थिरीकरण में वाइन की स्थिरता को प्रभावित करने वाले जीवों को हटाया जाता है और इसलिए पुनः-किण्वन या नुक़सान की संभावना कम हो जाती है।

शुद्धिकरण की प्रक्रिया का संबंध कणों को हटाने से है; खुरदरी पॉलिशिंग के लिए जो 5-10 माइक्रोमीटर से ज्यादा बड़े होते हैं, शुद्धि या पॉलिशिंग के लिए जो 1-4 माइक्रोमीटर से ज्यादा बड़े होते हैं। सूक्ष्मजीव स्थिरीकरण के लिए कम से कम 0.65 माइक्रोमीटर फिल्टरेशन की आवश्यकता होती है। हालांकि इस स्तर पर फिल्टरेशन वाइन के रंग और स्वरुप को हल्का कर सकते हैं। सूक्ष्मजीव स्थिरीकरण स्टेरिलिटी का संकेत नहीं देता है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि एक पर्याप्त मात्रा में खमीर और बैक्टीरिया को हटा लिया गया है।

बोतलबंद करना (बॉटलिंग)संपादित करें

वाइन को सुरक्षित और बोतल में अवांछित किण्वन को रोकने में मदद करने के लिए अंत में सल्फाइट की कुछ मात्रा मिलायी जाती है। इसके बाद वाइन की बोतलों को पारंपरिक रूप से कॉर्क के जरिये सीलबंद किया जाता है, हालांकि वाइन को बोतलबंद करने के लिए वैकल्पिक उपाय भी आजमाए जाते हैं जैसे कि सिंथेटिक कॉर्क और स्क्रूकैप, जिनमे कॉर्क की गंदगी आने की संभावना कम होती है और ये तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।[4] अंत में बोतल के सिरे पर एक कैप्सूल[5] लगाया जाता है और मजबूती से सीलबंद करने के लिए उसे गर्म[6] किया जाता है।

वाइन उत्पादक (वाइन मेकर्स)संपादित करें

परंपरागत रूप से इन्हें विंटनर के के नाम से जाना जाता है; वाइन के उत्पादन में शामिल व्यक्ति को वाइनमेकर कहा जाता है। इन्हें आम तौर पर वाइनरियों या वाइन कंपनियों द्वारा नियुक्त किया जाता है।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

फ्रांस में एक वाइन लेबलिंग मशीन.
  • वाइन संबंधी शब्दावली
  • वाइन में एसिड
  • शैम्पेन का उत्पादन
  • गवर्नो
  • वाइन में शक्कर